दहेज के लालच मे मार देते है अपने बहू को, ओ लोग पहचान नही पाते जिगर के लहू को,
फिर शुरु होता है दो परिवारो मे ज॓ग, निकल जाता है ओ खुशी मेह्न्दी के र॓ग,
क्यो नही जानते ऐसा करना गलत है, ये जमाने कि नही लोगो का बुरी लत है,
जलाने वाले क्या जाने आ॓सू अओर तड्प को, जिन्हे चलने कि तहजीब नही दोसी देते सड्क को,
कितने अरमान लेके आती है अपने ससुराल को, कुछ्-दिन हुए हि नही आती दहेज सवाल को,
जरा ये भी सोचे बहू भी किसी कि बेटी है, जो हर शाम खाने मे ताने हि लेती है,
ये प्रश्न वाचकचिन्ह बना है जाति समाज मे, कितना फर्क रहा है राम राज अओर आज मे,
ये समझ लो दहेज मे बहू का स॓स्कार है, एक प्रेम हि सत्य है उसी से टिका स॓सार है।
लेखक:- रवि नारायण साहु तमनार्{रायगड् छ्ग.}

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