जीवन में हर इंसान अपने आपको किसी न किसी बंधनों/समस्याओं से जकड़ा हुआ पाता है, चाहे वह पारिवारिक, सामाजिक, शारीरिक, मानसिक या किसी प्रकार से हीनभावना से ग्रसित हो। इन सभी विषयों पर हम यहाँ विस्तार से बातें करेंगे।
मानसिक समस्या:
मानसिक समस्या को हम कई भागों में या कई रूप में बदल सकतें हैं इसे नया रूप भी दिया जा सकता है। यह स्वःचिन्तन से स्वतः ही परिवर्तनशील भी है और इसे नियत्रंण भी किया जा सकता है। जो पारिवारिक, सामाजिक, शारीरिक समस्यों से भी जकड़ा हो सकता है। बिना किसी कारण के मानसिक समस्या पैदा नहीं हो सकती।
हीन भावना:
जबकि हीनभावना एक रोग मात्र है, इसका इलाज किसी के बताये मार्ग से ही किया जा सकता है। इसे कोई व्यक्ति चाहकर भी स्वतः दूर नहीं कर सकता। यह एक प्राकर का मानसिक जाल है, जो मनुष्य को धीरे-धीरे अपने जाल में उलझाता चला जाता है और संबंधित व्यक्ति के जीवन में अंधेरा लाने का हर पल प्रयास करता रहता है। जिसका कोई विशेष कारण नहीं होता। स्त्रीयों के अन्दर अकसर कपड़े और गहने को लेकर या पति के कारोबार और बच्चों की पढ़ाई को लेकर देखी जा सकती है, जबकि पुरुषों के भीतर ये लक्षण रोगात्मक या वंशानुगत भी हो सकते हैं।
संभवतः आप भी इसमें किसी एक पक्ष में अपने आपको खड़े पायें, ऐसा भी हो सकता है कि आप खुद को दोनों ही पक्षों में पाते हों।
जीवन ही ऊर्जा के इस प्रथम अध्याय में हम अपनी बात को यहीं से शुरू करेंगे।
महाभारत के युद्ध के समय हमने अर्जून - कृष्ण के संवाद को सुना होगा। आज के इस अध्याय को यहीं से शुरू करते हैं।
दृष्टेमं स्वजनं कृ्ष्ण युयुत्सुं स्मुपस्थितम्,
सीदन्ति मम ग्रात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायेते।।
युद्धक्षेत्र में जब अर्जून अपनी मानसिक स्थति को कृष्ण के सामने बयान करता है तो उसके अन्दर कुछ इसी प्रकार के लक्षण देखे जा सकते हैं। "युद्ध में अपने ही प्रियजनों को देखकर मेरा मुख सुखा जा रहा है, मेरे अंग शिथिल हो रहें हैं, मैं अपने आपको खड़ा रखने में असमर्थ पा रहा हूँ।
उपरोक्त श्लोक में अर्जून ने अपने भीतर उत्पन हो रहे वातावरण को निःशंकोच भाव से कृष्ण (अपने सारथी ) को कहते हुए, उनसे युद्ध न करने की अपनी मंशा को ज़ाहिर कर खुद को सामाजिक बंधन से मुक्त करने की प्रर्थना भी करतें है।
हम यहाँ इसी संवाद के लक्षणों पर गौर करगें, तो यह पातें हैं कि मानसिक समस्या के जो-जो लक्षण होने चाहिये वे सभी श्री अर्जून में उससमय विद्यमान पायें गये, जबकि हीनभावना के लक्षण को यहाँ नहीं देखा जा सका। -क्रमशः
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जब मन मे हीन भावना घर करने लगे तब गुरू की शरण मे जाना चाहिये