बात सन्‌ 1933 की है ! गाँधीजी ने अपनी जेल-मुक्ति के बाद 'हरिजन सेवक संघ्' की एक बैठक में पूछा, "क्या 'हरिजन सेवक संघ्' के सदस्य सच्चाई के साथ यह दवा कर सकते है कि उन्होंने स्वम आपने हृदय से अस्पृश्यता को पूरी तरह मिटा दिया है ?"
एक सदस्य ने प्रश्न किय, "इस सम्बन्ध में आपकी कसौटी क्या है ?"
गाँधीजी ने पूछा, "आप विवाहित है ?"
सदस्य ने उत्तर दिया, "जी हाँ !"
गाँधीजी बोले, "तो क्या आपके कोई अविवाहित लड़का या लड़की है ? यदि है ,तो उसका धार्मिक भावना से किसी हरिजन के साथ विवाह कर दीजिये ! तब में आपको आपने खर्च पर बढ़े का तार भेजूगा !"
और उन्होंने कुछ समय बाद आश्रम में निरीश्वर्वादी ब्राह्मण अध्यापक की पुत्री का विवाह अध्यापक के नास्तिक हरिजन नवयुवक शिष्य के साथ कराने का निश्चय किया और उसी समय यह घोषणा भी की कि भविस्य में मेरे आशीर्वाद उन्हीं दंपति को मिलेंगे , जिनमें से एक हरिजन होगा !"

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