उम्र पाकर भी मर रहा आदमी,
आँख का अंधा रहा हो,
पांव का लंगड़ा भले हो,
मस्तिष्क में भले ही
शून्य ने ले रखी जगह हो;
पर हर तरफ ही हर तरफ-
सिर्फ छा रहा है आदमी
छिन कर सुख-चैन सबकी-
सो रहा खुद ही आदमी
घर-घर में बूढ़े माँ-बाप-
खोज रहें हैं आदमी
गाँव का मरता किसान -
खोज रहें हैं आदमी
संसद में तड़पता लोकतंत्र-
खोज रहें हैं आदमी
माँ की कोख में भी अब -
खोज रहें हैं आदमी
हर तरफ बस एक ही बात
आदमी को आदमी
खा रहा है आदमी।
- शम्भु चौधरी , एफ.डी.-४५३/२, सल्टलेक सिटी, कोलकाता-७०००१६ ३०.५.२००९