मैं रहता था तेरे घर,
मेरा घर था तेरा घर।
इक अंगना और इक छत थी,
इक धरती थी, इक अम्बर।
घण्टी और अज़ान एक थी,
इक चादर, इक पीताम्बर।
मेरे जन, तेरे बन्दे,
जहर बुझे, तीखे तेवर।
पूजा स्थल के पास खडे,
दोनों ही काँपें थर-थर।
मन्दिर की धक्कमपेल देख,
मैं राम खडा ताकूँ बेघर।
चादर तार-तार हो गई,
कीच में लिपटा पीताम्बर।
तेरा तन जो है घायल,
घाव लगे मेरे मन पर।
ध्वज मेरा धराशायी हुआ,
जब लूटा था तेरा घर।
तेरी जो दीवार गिरी,
कहां रहा मेरा भी घर।
दिवाली बनी है शोक दिवस,
वन गमन हुआ दशहरे पर।
अंधियारे को भेद न पाया,
चिराग राम का कोई द्गार।
मन भटकाते उगलें शोले,
ओढें आस्था का आडम्बर।
मारीच और शैतान घुसे,
लोक लुभावन चेहरे धर।
द्वारपाल ही बन बैठे स्वामी,
जय विजय स्वर्ग सिंहासन पर।
मैं रहता था तेरे घर,
मेरा घर था तेरा घर।
इस सुन्दर कविता में सिर्फ समस्याएं और सम्वेदनाएं हें ,
आपसे अपेक्शा हे कि समाधान और सुनहरी योजनाएं भी अपनी कविता में शामिल करें !