जन्म दिया था मात पिता ने
ओर मिली यह नश्वर काया
दिशाहिन ओर लक्श्यहीन थे
पग पग पर बाधा को पाया

किन्तु सफल कर दिया जन्म यह
कर्म योग का पाथ पडाया
'रिणी आपके सदा रहेंगे'
पुलकित रोम रोम ने गाया

ग्यान पंख दे दिये आपने
मुक्त गगन उडना सिखलाया
तापित शापित इस जीवन पर
बनी रहे यह शीतल छाया

शब्द रुप मे ब्रह्म रुप का
भला कहीं आलोक समाया ?
किन्तु चरण तव धषट शिष्य का
प्रति अपराध क्श्मा ही पाया !

PostHeaderIcon GURU IS A BEST TEACHER



A teacher-an ocean of knowledge and thought

Fills the hunger of every taught

He never expects any return

Distributes the knowledge with all the fun

He is like a shady tree

That provides shelter to all but free

What noble profession it is!

The more he teaches the more he enriches

Commands the respect from all and sundry

I pray to the almighty

To give long life and strength

To my Guru

PostHeaderIcon ध्न्यवाद


गुरु वन्दना पर अपने विचार लिखने के लिये ध्न्यवाद !
मेरे गुरु श्री लक्श्मि नारायन जी शर्मा जोध्पुर युनिवर्सिटि के रिटायर्ड रीडर है
८६ वर्शीय ओर अत्यन्त ग्यानी
मेरे जीवन को वस्तविक अर्थ मे उन्होने दिशा दी है
उनकी छ्त्र छाया मुझ पर हमेशा बनी रहे
आपकी शुभकामना मेरे लिये सम्बल स्वरुप है
पुन पुन धन्यवाद !

PostHeaderIcon सदगुरु ही कुशल मल्लाह



अध्यात्मिक-यात्रा
हम सब प्राणी इस संसार रुपी भव सागर में यात्रा कर रहे है! और सभी यात्री चाहते है कि उनकी यात्रा सफलता पूर्वक पूर्ण हो! सागर में सफल यात्रा के लिए निम्नलिखित तीन बातो की आवश्यकता होती है।

1अनुकूल वायु

2नाव

3क़ुशल मल्लाह

1परमेश्वर की कृपा ही अनुकूल वायु है।

2 परमेश्वर का नाम ही नाव है।

3 सदगुरु ही कुशल मल्लाह है।

बिन सत्संग विवेक न होई,राम कृपा बिन सुलभ न सोई।

राम की सबसे बड़ी कृपा सदगुरु की ही प्राप्ति समझनी चाहिए। सदगुरु ही ईश्वर का नाम प्रदान करते है और कुशल मल्लाह की तरह भवसागर से पार ले जाते है।

सदगुरु पर पूर्ण विश्वास होना चाहिए और उनके आदेशानुसार नामजप नियमपूर्वक करना चाहिए। नियम से नामजप करने से जगत का आर्कषण कम होकर मन ईश्वर में रम जाएगा। सुरती पिण्ड देश ( मायिक क्षेत्र) से उठकर उच्च सोपानों पर पहुचँकर दिव्य आनन्द का रसपान करेगी। इस समय माया बहुत से प्रलोभन दिखाती है इसलिए साधक को बहुत सावधान रहने की आवश्यकता है।
सदगुरु का शिष्य अपने पुरुषार्थ को प्रमुखता न देकर अपने गुरु की कृपा को ही प्रमुखता देता है। जिससे वह कर्तापन के दोष से बचा रहता है।भक्तिमार्ग में अहंकार साधक का सबसे बड़ा शत्रु है। भगवान श्री राम ने अपने सेवको का अभिमान लव-कुश से तुड़वाया और भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन का गर्व भीलो से खंडित करवाया था। ऐसे ही सदगुरु के मार्गदर्शन मे साधना करने का विशेष लाभ यह होता है कि सदगुरु अपने सेवको को भक्ति का खजाना भी बख्शते है और अहंकार आदि शत्रुओं से सेवकों की रक्षा भी करते है।

PostHeaderIcon प्रेरक बल


आपकी प्रतिक्रिया से मुझे प्रेरक बल मिला है .
भक्ति मार्ग मै अहकार सबसे बडा शत्रु है, यह एकदम सच है .
पर ससार मै अहकार का "दिखावा" कर के ही अपने को "सामयिक","सबल" और "सफल" सिद्ध किय जा सकता है.
आपका क्या खयाल है?

PostHeaderIcon नहीं दीदी!



नहीं दीदी! केवल भक्तिमार्ग ही क्‍यों-----
जीवन के हर क्षेत्र में बाधक है अंहकार
चाहे हो परिवार, चाहे हो व्‍यापार
निरांहकारी को पसन्‍द करे सारा संसार
अंहकारी को नहीं मिलता सच्‍चा प्‍यार

PostHeaderIcon आपका मत


मै आपके मत से पूरी तरह सहमत हू .
पर बहुत सरल होने से लोग हमे छ्लते है ,"यूज" करते है . मन मै पीडा तो होती ही है न !

PostHeaderIcon ठगना पाप है ठगे जाना पाप नहीं।


छलना पाप है छले जाना पाप नहीं।

PostHeaderIcon गुरु-वंदना


वे लोग बहुत भाग्यशाली होते हैं, जिन्हें ठीक समय पर सही गुरु मिल जाए ।

PostHeaderIcon सौभाग्य


मै बहुत सौभाग्यशाली हू कि मुझे सही वक्त पर मेरे गुरू मिल गये !
सौभाग्य से आप सबका सकारात्मक वैचारिक सहयोग भी मिल रहा है .

यह बात बिलकुल सच है कि छलना ही दुखदायी होता है . स्वयं छ्ले जाना नहीं । अहंकार इतना सूक्ष्म तत्व है कि आसानी से काबू में नहीं आता । इसीलिये स्वयं का छले जाना हमारा मन जल्दी से स्वीकार नहीं करता ।

श्री मनोज भारती और श्री आजाद दोनों ही चिंतन और मनन करते हुए
अपने मौलिक विचार अभिव्यक्त कर रहे हैं ।
आभारी हूं !

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सभी सदस्यों, लेखकों, वाचकों तथा हिंदीप्रेमियों को हिंदीभाषी परिवार की ओर से हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ।

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