उन दिनों रांची में स्वराज्य-पक्ष की परिषद् थी !एक दिन सबेरे के समई गाँधीजी कई नेताओं के साथ मंच पर बैठे हुए बहुत ही आवश्यक राजनैतिक चर्चा में व्यस्त थे ! उन्हीं में मीनू मसानी भी थे ! उसी समय कोई व्यक्ति मसानी नाम की चिट्ठी लेकर आया ! चंद्रशंकर शुक्ल ने ,जो उस समय गाँधीजी के साथ काम करते थे , वह चिट्ठी लेकर अपने पास रख ली !
आढाई घंटे के बाद वह चर्चा समाप्त हुई ! आसानी चले गए , तब जाकर शुक्ल ने वह चिट्ठी गाँधीजी को दी ! गाँधीजी ने पूछा , "यह चिट्ठी कब ऐ थी !'"
शुक्ल ने जबाब दिया , "क़रीब आधा घंटा हुआ होगा, लेकिन आप जरूरी बातें कर रहे थे , इसलिये उस समय नही दे सका ! "
गाँधीजी बोले , " दे क्यों नही सके ? आते ही दे डैनी चाहिये थी ! इसमें कौन सा खलल पास जाता ? तुम जानते हो मसानी कौन है ? "
चंद्रशंकर शुक्ल ने उत्तर दिया ,"नही! "
गाँधीजी को बड़ा आश्चर्य हुआ ! बोले , " इनके पिता से मेरा बहुत पुराना परिचय है ! जाओ उन्हें ढूड निकालो ! उन्हें यहीं खाना खिलाना और यही ठहराना !"