हिल्ले पठनीयता बहाने जन्मदिन

फ़िलहाल कुछ नहीं लिखने का मन था । अब तो एक धड़का और लग गया है, पठनीयता का ! भला बताइये, आपका निट्ठल्ला अपने टैग को सार्थक करने कहाँ जाये ? मेरी पठनीयता बिन सोचे ही आती है ! इधर उधर से पोस्ट उधार ले लेकर अच्छा ख़ासा ब्लाग-यापन कर रहा था । इतने में लिखने की यह मज़बूरी मुझ पर टूट पड़ी । सो, पठनीयता सिद्धाँत की सादर अवहेलना करते हुये, अपने कम्प्यूटर का कीबोर्ड खटखटा रहा हूँ । देखो, क्या निकलता है ? पढ़ ले, बाद में पछतायेगा, अबहिन झेल सके तो झेल । हाँ तो, सुना किया कि आज जन्मदिन है । सकल जग में नित नये प्राणी जनमते हैं, और एक सूर्योदय से अगली सुबह तक दिन में शुमार होता है । बोले तो हर तारीख़ जन्म दिनों से अटी और फटी पड़ रही है ! लेकिन मेरा निवेदन है कि इसे आप बँधुओं ने नाहक ही कुछ ख़ास बना दिया । जनश्रुति है कि मेरा जन्म आज के दिन हुआ था । जब जनश्रुति है, तो मानना ही पड़ेगा.. काहे से कि जनश्रुतियाँ प्रमाण की मोहताज़ नहीं हुआ करतीं । कौव्वा कान ले गया, तो मान लीजिये कि ले ही गया होगा, आख़िर इत्ते जन झूठ बोल कर अपने को उससे कटवाने का रिस्क क्यों लेंगे ? तो, यह मान लेने में कोई बुराई नहीं दिखती कि आजै हम जन्मे थे । ब्लागर शोधार्थी इसे बुकमार्क करें कि, इस महान निट्ठल्ली विभूति का जन्म सँभवतः आज ही के दिन ( पढ़ें रात ) हुआ था ! जरा प्रेम से बजाइये तालियाँ... या खटखटा ही दीजिये कुछ स्माइलियाँ !

अब पूछिये कि, सँभवतः काहे ? सँभवतः इस करके कि, जैसी कि परम्परा है हर महान विभूति ( निट्ठल्ली हुई तो क्या ) का जन्मदिन और जन्मस्थान विवादों में रहता आया है । तऽ हम्मर जनम के ठाम छई दरभँगा ! ओफ़्फ़ोह, ई मैथिली तू कहाँ ठँसी चली आ रही है, बबुनी ? द्वार-भँगा = दरभँगा = और लीजिये हम जनम गये ! जन्म दिन को लेकर अलबत्ता कुछ विवाद है । जन्मदिन के विवाद की सुनवाई जारी है, और मेरे जीते जी तो यह सुलटने वाला नहीं दिखता । यदि विवाद सुलटाने के लिये ही खड़े किये जायें, तो वह विवाद किस काम का ? इसे चलते रहना चाहिये, कुछ शोधार्थी अपनी थीसिस सेंक लेंगे, व रोजी पायेंगे !

उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर मेरा जन्म दिन एक जुलाई को ठहराया गया है । अभिलेख तो आख़िर अभिलेख ही होते हैं, इन पर डाउट नहीं किया जा सकता । इनमें जान है, यह जिसको चाहें मृतक घोषित कर दें और यदि चाहें तो, किसी भी मृतक को आजीवन पेन्शन का हक़दार बना दें । फिलहाल तो मेरा हाई स्कूल ( वह भी किया है, भाई ) का सार्टीफिकेट और एम.सी.आई. पँजीकरण तो यही प्रमाणित करता है कि एक जुलाई सन उन्नीस सौ दहाई इकाई को मेरा जन्म हुआ था । सो इवेन, आलमाइटी कान्ट चैलेन्ज़ इट, स्साला ! मुझे तो लगता है कि, इस नश्वर सँसार में ईश्वर के बाद कुछ भी सत्य है, तो वह अभिलेख है, अभिलेख ही है, अभिलेख ही है । बस यूँ समझिये कि जाको कृपा पँगु गिरि लाँघें के बाद ” जाकौ लिक्खा मरा पिन्शन पावै ’ की ताकत ही दुनिया चला रही है । जी, मैं अमर कुमार.. ठीक है ठीक है, लाइये कागज़ दिखाइये । गोया क़ागज़ न दिखाया तो मैं समीर लाल में गिन लिया जाऊँगा, मैं तो पूरा भी न पड़ूँगा, भगवन ! न जाने हमारे वँश के किस पुण्यात्मा ने चित्रगुप्त के लेखे में यह हेराफेरी कर दी ? उन बुज़ुर्ग बेचारे ने भरसक अपनी लाला बुद्धि ही लगाई होगी कि, बड़ा होकर बाबू किरानी ही बनेगा तो सर्विसबुक बनाने वाले को आसानी होगी । ईश्वर उनकी आत्मा को क्रीमी लेयर में बख़्शे । शायद इसी बहाने मैं बिना प्रयास डाक्टर बन सका, क्योंकि एक जुलाई डाक्टर्स डे है, हमारा दिन !

उधर मेरी अम्मा का दावा है कि, उनकी गणना के अनुसार मेरी जन्मतिथि हमेशा से 29 अगस्त ही है । उनके वर्णन के अनुसार, वह भादों की एक भयानक अँधेरी रात थी, तेज अँधड़ के साथ लगातार मूसलाधार बारिश हो रही थी । उन्हें ठीक से याद नहीं कि बिजली कड़की भी थी या नहीं, पर उसी रात मेरा जन्म हुआ, यह तो उन्हें पक्की तरह याद है । वह यह भी सनद देती हैं कि, मेरे जन्म की ख़बर सुनते ही सिनेमा ( प्रोजेक्टर ) आपरेटर चाचा जी झूम उठे, और स्क्रीन पर ’ आग ’ चलती हुई छोड़ छाड़, घर को भाग खड़े हुये । इस नाच कूद में रेलवे लाइन पर अपना एक पैर चोटिहल कर बैठे, और इसके साथ ही उतनी रात में दुकान खुलवा कर पेड़ा लाने का उनका गुमान स्लीपरों पर बिखर गया वह अलग ! फलतः मुझ वस्त्रहीन बालक के ’ केहाँव केहाँव ’ में उनकी ’ हाय हाय’ के आर्तनाद ने अनोखी सँगत दी, बरसात का पार्श्वसँगीत तो पहले से ही था । कुछ सुनगुन मची, और पड़ोस के पँडित जी को तत्काल सूचना भेजी गयी कि वह फौरन लालटेन जला कर गणना करें कि जातक मूल का है या ब्याज़ में मिला है ? उनींदे पँडित जी ने जम्हुआते हुये डिक्लेयर किया कि यदुनाथ सिन्हा अगर ज़िन्दा बचें हैं, तो इसी बालक के पैर लक्षण से , काहे कि ठीक अढ़ाई मिनट बाद उस लाइन से समस्तीपुर सटल पास की है

जननी से बड़ा भी कोई साक्ष्य होता है, क्या ? सो, यह तय समझिये कि, ख़ाक़सार भादों की उपज है, यानि अगस्त, द 29, सन ( अभी तय नहीं ), क्योंकि मेरी माताश्री अपनी अनोखी रिवर्स मैथमेटिक्स से इसमें हर साल एक वर्ष की घटतौली कर देती हैं । मसलन पिछले वर्ष यदि मैं सन 1954 में पैदा हुआ था, तो इस वर्ष यह 1955 हो जायेगा, बल्कि हो चुका है । आपलोग क्या इतना भी नहीं समझते कि, 54 के बाद 55 ! शायद इसी बहाने वह अपनी उम्र में साल दर साल एक एक वर्ष कम करते हुये, श्री चित्रगुप्त महाराज की आँखों में धूल झोंकती आ रही हैं । कौन मरदूद कहता है कि, ज़िन्दगी में आगे बढ़ने को पढ़ना ज़रूरी है ?

यह तो हर आम और ख़ास ब्लागर ने सुना ही होगा कि, “ गये थे ब्लागलेखन को, विवाद गले पड़ गयी !” बल्कि अपुन की हिन्दी ब्लागिंग में यह तो अनुभवसिक्त एवँ स्वयँसिद्ध सूत्र है कि,” आये थे पठन पाठन को , घोटन लगे विवाद ! “ निट्ठल्ला भला अपवाद क्यों रहे, अपने सँग विवादित जन्मतिथि ले आया

बात अभी ख़त्म नहीं हुई है ( शब्द सँख्या 3616, और समय सायँ के 11.34 PM ) , इस विवाद को अभी और तूल पकड़ना बाकी है ! हमारे ब्लागजगत में यूँ तो कई भाई हैं, पर एक भाई ऎसा भी है, जो अकेला सभी पर भारी पड़ता है । उनके डील डौल की बातें तो खैर अभी जाने ही दीजिये, काले चश्में में उनके तेवरिया पोज़ का फोटो देख हर अदना-फदना ब्लागर स्वतः ही उन्हें भाई मान लेता है । अपने चार्टर्ड यू.एफ़.ओ. की वज़ह से वह सभी की ईर्ष्या का पात्र भी हैं, पर बोलता कोई नहीं । तो, भाई भिनसारे ही आकर मेरे आर्कुट की स्क्रैपबुक छेंक लिये, बोले “ आज आपका जन्मदिन है । जन्मदिन की बधाई हो ! “ मैंने फौरन ही अपना टास्कबार ताड़ा, 28 Aug AM 7:18:11, Friday ! इन भाई से कौन से भिड़े ?

चलो छोड़ो, जरा घूम टहल कर आते हैं, फिर इनसे पूछूँगा, “ आपकी घड़ी बहुत फ़ास्ट चलेली है, भाई ? “ पर उन्होंने अवसर ही न दिया । इस बार टिप्पणी बक्से में प्रकट होते भये, और फिर वही, “ आज आपका जन्मदिन है । जन्मदिन की बहुत बहुत बधाईयाँ और शुभकामनायें !“ यह देख हम पड़ गये तरद्दुद पेशोपेश में, लिहाज़ करता हूँ तो मेरे पैदा होने की 28 अगस्त, एक नयी तारीख़ पैदा हुई जाती है, अगर कुछ ज़वाब भेजता हूँ तो बी.पी. ( उनका ) हाई होने को धमकाता है । फोन नम्बर भी नहीं है ! टिप्पणी बक्सा थोड़ा हरकत में आया और, एक अदद “ जय हो ! जन्मदिन मुबारक हो ” चमकने लगा । यह भाई के सरकिट तो नहीं, बल्कि अपने फ़ुरसतिया थे । लगता है, पूरा इंतज़ाम रहा, उनके ठीक पीछे ज़नाब वकील साहब पँडित दिनेशराय द्विवेदी भी गवाही में लगे थे ! आपका वकील ही गवाह बन जाये,तो बोल हरि गँगा !

तो श्रीमँत, मैं अपने तीन तीन जन्मदिन लेकर कहाँ जाऊँ ? सुना था कि, देख छिनरो के तीन तीन भतार ! पर यहाँ तो तीन जन्मदिन दावा ठोंके पड़े हैं । कहीं मी लार्ड ने केस ख़ारिज़ कर दिया, तो फिर यही होगा कि मैं पैदा ही नहीं हुआ था। मैंने बोला था न कि अभिलेख बोलते हैं, सुनिये,”आप कतार में हैं, यानि मैं ? “

पँडिताइन से कहा तो चमक पड़ीं, “ और गाँज़ाखोरों की सँगत करो !“ ऎई, गलत बात बोलियो मति, इसमें अपुन के भाई इन्वाल्व हैं, मैं तमक गया । पलट गयी तिरिया, अम्मा से नज़रें बचाकर और आँखें घुमाय के गुनगुनाय दिहिन, “ सज रही गल्ली तोरी माँऽऽआँ, चूनर गोटे में.. ऎं ऎं,” और ये ये येह्ह फटाक ! मेरे चेहरे के पास लपक कर बजती है एक ताली ! हैप्पी बड्डडे, हाँज्जि ! ऒऎ थैंक यू, शैंक यू.. हाँज्जि !

भला होवे पाबला प्राजी नूँ होर पुत्तर कुश दा ते एनाउँस कित्ते के साड्डा खालस बड्डे उन्तीह अगस्त हाँ !

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I visited this sight for the first time and found it much informative and knowledgeable but I would like to add that currently we are living in the era of IT but unfortunately more than half of world population is illiterate. Out of those a few are computer and internet familiar so the target market for internet marketing is niche. Therefore the developed nations should promote IT as well as computer literacy in these developing areas so the target market can be increased in future.

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