मौन मुखर हो गया, सहज वाणी भी जब
निर्द्वंद्व बनी
व्याकुल मन को आलोडित कर
तब पीडा एक छंद बनी !
काल-चक्र के पात्र में हंसकर
जब व्यतीत का कालकूट भर
वर्तमान कंटकयुत पथ पर
अभिलाषा मकरंद बनी
तब पीडा एक छंद बनी !
करुणा के क्षण नभ बन जाते
विहग व्यथा की कथा सुनाते
दिशा नयन जब भर भर आते
क्षितिज परिधि प्रतिबन्ध बनी
तब पीडा एक छंद बनी !
करुणा के क्षण नभ बन जाते
विहग व्यथा की कथा सुनाते
दिशा नयन जब भर भर आते
क्षितिज परिधि प्रतिबन्ध बनी
तब पीडा एक छंद बनी !
बहुत सुंदर कविता है । बहुत बहुत बधाई ।