सुबह लगभग पौने पांच बजे आंख खुल गई । धडकते हृदय से बालकनी में झांक कर देखा तो सबकुछ ठहरा ठहरा सा महसूस हुआ । उसने दूध नही पिया ? उस्ने गंदगी भी नहीं की ? वह सो रहा था ? धीरे से गेट खोल कर मै उसके करीब ऊकडूं बैठ गई । वह निश्चल... निश्चेष्ट... निर्जीव ...। आह... ! पर मेरी कराह वहां कौन सुनता ?
घटना के दो तीन दिन बाद मै घर से बाहर निकली तो वही काला कुत्ता मुझे खडा दिखा । नही...। उसके थन दिखे । तो यह काली कुतिया है । मेरी आंखें उसकी पीली मटमैली आंखों से टकराईं । उसकी आंखे कुछ कह रहीं थीं । पर क्या ? पता नहीं । मैने इस पर ज्यादा नही सोचा । अपना काम करने की चिन्ता मे अनमनी सी व्यस्तता समेटे मै चल पडी । लगभग १५-२० दिन बाद उसी काली कुतिया और उसके तीन भूरे और तीन काले पिल्लों को मैने देखा । उस कुतिया ने भी रुक कर मुझे देखा और अपनी पूंछ हिलाई ।
शायद...शायद इसी का तो वह बच्चा नही था ? कही इसी ने तो उस दिन नाले मे से उसे उठाते मुझे नहीं देखा था ? कही यह उसे बचाने के लिये ही शुक्रिया तो अदा नही करती अपनी दुम हिला कर, जिसे मै बचा न सकी ? कही यह उसे खोजती तो नही फिरती ? कही मुझसे अपने बच्चे का पता तो नही पूछती यह ?
प्राणी शास्त्री ही इसका अर्थ समझ या समझा सकते हैं कि क्या कहती थी इस मां की बॉडी लेंग्वेज !
अपनी संवेदनशीलता को व्यर्थ के प्रश्नों में मत उलझाओ । आपने जो किया वह प्राणी-मात्र के प्रति सहज और स्वत: स्फूर्त मानवीय स्वभाव है । जो आज की आपाधापी और यांत्रिक बनती जिंदगी से खोता जा रहा है । मनुष्यता उस दिन खो जाएगी जब मनुष्य पूरी तरह यांत्रिक हो जाएगा । इसी लिए किसी ने क्या खूब कहा है कि अतीत का खतरा था कि मनुष्य को दास बनाया जा सकता है और भविष्य का खतरा है कि मनुष्य को रोबोट बनाया जा सकता है । एक संवेदनशील रचना देने के लिए आपका धन्यवाद ।।।