मानव की मिथ्या् कल्पानाएं उसके श्रेयस् पथ की पूर्ण सिद्धि में महानतम अवरोध हैं। मानव की चिर अभीप्सित, लक्षित एवं आकांक्षित वस्तु है-सत्य । सत्यानुशीलन के पथ में बाह्य आकस्मिकताओं का विस्मरण जिस तत्व् में संभव है,वह है-सेवा तत्व।
सेवा अर्थात अहं का सम्रग मूलोच्छेदन। साधक की सम्प्रति आत्मिक उपलब्धियों का मार्ग प्रशस्त करने में जो तत्व मूक रूप से नाटिकीय भमिका का निर्वहन करता है वह तत्व सेवा ही है। सेवा गोपनीय तत्व है जो साधक को विराट् की सकल गुत्थियों को सुलझाने और सम्प्रति जीव जगत के रहस्यों को अनावृत करने की शक्ति प्रदान करता है।
‘‘जितना ही अधिक निष्काम कर्म किया जाये, उतनी ही अधिक चित्त-शुद्धि होगी। जितनी अधिक चित्त-शुद्धि होगी, उतना ही अधिक ह्रदय विशाल होगा। जितना ही ह्रदय विशाल होगा, उतना ही हम अपने श्याहमसुन्दर के समीप होंगे।’’