महगाई इस कदर बढ गई,
चीनी मुह को कडवा कर गई,
देसी घी विलुप्त हो गया,
बटूआ अपना खाली है.
काहे की दीवाली है
लगी आग तो तेल मे
काला बाजारी के खेल मे
दाल का खाना स्वप्न हो गया
खाली अपनी थाली है
काहे की दीवाली है
दिया-पटाखा, खील बताशा
आग लगा के देख तमाशा
खर्चो की बाढ तो आ-ली है
काहे की दीवाली है
बीबी की साडी,बच्चो के कपडे
खर्चो के है कितने लफडे
ऊपर से आई साली है
काहे की दीवाली है
साहब अब तो आने को होली है,
साल भी बदल गया लेकिन अब भी खली झोली है.
दिन-ब-दिन इस महगाई ने बन्द कर दी अपनी बोली है.
साधुवाद देता हू आपको, क्यूँकी ..........................
आति-प्यारी आपकी बोली है.
ध्न्यवाद.