महगाई इस कदर बढ गई,
चीनी मुह को कडवा कर गई,
देसी घी विलुप्त हो गया,
बटूआ अपना खाली है.
काहे की दीवाली है

लगी आग तो तेल मे
काला बाजारी के खेल मे
दाल का खाना स्वप्न हो गया
खाली अपनी थाली है
काहे की दीवाली है

दिया-पटाखा, खील बताशा
आग लगा के देख तमाशा
खर्चो की बाढ तो आ-ली है
काहे की दीवाली है

बीबी की साडी,बच्चो के कपडे
खर्चो के है कितने लफडे
ऊपर से आई साली है
काहे की दीवाली है

PostHeaderIcon काहे की दीवाली है पर "मेरी प्रतिक्रित्या"


साहब अब तो आने को होली है,
साल भी बदल गया लेकिन अब भी खली झोली है.
दिन-ब-दिन इस महगाई ने बन्द कर दी अपनी बोली है.
साधुवाद देता हू आपको, क्यूँकी ..........................
आति-प्यारी आपकी बोली है.
ध्न्यवाद.

भाषा बदलें ।
हिंदी
अंग्रेजी

Ctrl+\ दबाके भाषा बदलें ।
हिन्दी दिवस

सभी सदस्यों, लेखकों, वाचकों तथा हिंदीप्रेमियों को हिंदीभाषी परिवार की ओर से हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ।

सदस्य आगमन
सक्रिय सदस्य
इस समय 0 सदस्य और 3 अतिथि आये है।
नया कौन है?
  • Buchanan25DOROTHY
  • कविता वर्मा
  • anup rajput
  • vicon628
  • Vankurik