हिन्दूधर्म को सनातन धर्म कहा जाता है अर्थात जो सदा से है। बाकि धर्मो का इतिहास है कि उनका जन्म कब और किसके द्वारा हुआ परंतु कोई माई का लाल हिन्दू धर्म के जन्मकाल को प्रमाणित नहीं कर सकता। जैसे भगवान, भक्ति और भक्त शाश्वत है ऐसे ही हिन्दूधर्म भी शाश्वत है, अनादि है। जिसका जन्म होता है उसका अंत भी होता है परंतु जिसका आदि नहीं उसका अंत भी नहीं। भारत के हजारों साल के इतिहास में हम कई बार भयानक समय से गुज़रे हैं मगर भारत के वीरों ने हर कठिन समय का डटकर मुकाबला किया है। कितने देश, संस्कृतियाँ मिट गयीं, कितनी नयी महाशक्तियां बनीं-मिटीं मगर हम थे, हैं और रहेंगे - एक महान संस्कृति, एक महान राष्ट्र। हर बुरे वक़्त के बाद हम पहले से बेहतर ही हुए हैं। मुझे इकबाल की कही हुई पंक्तियाँ याद आ रही हैं,

कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी।
सदियों रहा है दुश्मन, दौरे ज़मां हमारा।।
र्इसाईयों के यहां भगवान अपना पूत भेजते हैं मुसलमानों के यहां दूत भेजते हैं परंतु हिन्दुए के घर भगवान स्वेयं अवतार लेते हैं। हिन्दू शब्दं धर्म का पर्याय बन गया है कोई भी हिन्दू खानदान ऐसा नहीं मिलेगा जिसके सभी सदस्य नास्तिक हों। हां ये हो सकता है कि कोई राम का उपासक तो कोई शिव या दुर्गा मां का अथवा कोई अपने सदगुरू की उपासना करता हो। हमारे यहां ग्रामिण महिलाएं भी चरखा कातते समय सोंऽहम का जाप करती और गीता के श्लोकों का पाठ करती मिलेंगी। हम भारतीयों की रगों में खून की जगह धर्म बहता है, ज्ञान,भक्ति और निष्काम कर्म की त्रिवेणी बहती है। दिल की धड़़कन के स्थान पर राम-नाम संकीर्तन सुनाई पड़ता है। जब किसी महात्मा को अकस्मात गोली लगती है तो राम-नाम दिल से मुख पर आ जाता है। किसी भक्त को जब विष दिया जाता है तो विष अमृत बन जाता है। देखिए- मरू मंदाकनी मीरा का जीवन चरित्र। शायद संसार में कोई ऐसी गोली नहीं बनी कोई ऐसी सूली नहीं बनी, कोई ऐसा विष नहीं बना जो भक्त को मार सके।

PostHeaderIcon भाषा का विशेष महत्व़



प्रत्येक धर्म, संस्कृति में उसकी भाषा का विशेष महत्व़ होता है। अंग्रेजी भाषा का उपयोग अंर्तराष्टीय- सर्म्पक और डिजीटल-यंत्रों के उपयोग के लिए अच्छा है क्योंकि 8 के अंक में अंग्रेजी के सभी अक्षर दर्शाए जा सकते है परंतु अध्यात्म के लिए हिंदी जोकि संस्कृत का ही सरलतम रूप है सर्वश्रेष्ठर भाषा है। सदगुरू, अवतार, लीला, इष्ट आदि अध्यात्मिक शब्दों के लिए अंग्रेजी में उचित शब्द उपलब्ध नहीं हैं। मेरा यह मानना है कि हम लिख-पढ़ भले किसी भी भाषा में लें लेकिन सोचते,चिंतन-मनन तो अपनी मातृभाषा में ही करते हैं और जिस भाषा में विचार किया जाए उसी भाषा में ही उन विचारों का आदान-प्रदान सर्वश्रेष्ठता से कर सकते हैं। शायद यही कारण रहा होगा कि वेदों का भाष्य मैक्समूलर की अपेक्षा करपात्री जी महाराज श्रेष्ठता से कर पाएं। क्योंकि महाराज जी की मातृभाषा हिन्दी ही थी।
हां यह सही है कि (गलत मानसिकता के कारण) सरकारी दफ़्तरों, बैंकों, होटलों आदि में अंग्रेज़ी बोलने से अच्छा रौब जम जाता है और शायद काम बनाने में भी आसानी हो जाती है. लेकिन देश की आबादी बहुत बड़ी है, सब हाइ प्रोफाइल लोग नहीं हैं कि उन्हें सरकारी दफ़्तरों और पांच सितारा होटलों से ही काम पड़े. आप उससे नीचे उतरते ही हिंदी या क्षेत्रीय भाषा में ही बात करेंगे. हिंदी खत्म नहीं होगी, बढ़ेगी। हिंदी को देश के क़रीब 70 फ़ीसदी लोग समझते हैं. इसके दायरे को सीमित नहीं कहा जा सकता है बस एक दृढ़ निश्चय ही हिंदी को लोकप्रिय भाषा बना सकता है. हिंदी भाषा सक्षम है और इस भाषा में अंग्रेज़ी के कई शब्दों को अपने आप में समेटने की शक्ति है। हिंदी हमारी मातृभाषा है जो यह बताने के लिए पर्याप्त है कि इसका दायरा सीमित नहीं है. दुनिया की चौथी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है।

PostHeaderIcon अंग्रेज़ी औपचारिकता की भाषा



अंग्रेज़ी औपचारिकता की भाषा हो सकती है, लेकिन आत्मीयता की भाषा तो हिंदी ही है। दोस्तों-रिश्तेदारों के बीच की भाषा, बाज़ार की भाषा तो हिंदी ही है। अंग्रेज़ी में आत्मीयतासूचक सम्बोधनों का अभाव है। चाचा,काका,ताऊ,मामा,फूफा सबके लियें ही अंकल और इन्ही रिश्तों के स्त्री लिंग हेतु आंटी सम्बोधन है। जीजा हो या साला दोनों ही के लिए ‘ब्रदर इन ला’ पता ही नहीं चलता कि कौन जीजा, कौन साला। कानूनी भाई- कानूनी बेटी अरे कानून तो रिश्तें तोड़ने के समय काम आता है। सम्बंन्धों का मूल आधार तो प्रेम है और प्रेम में नियम नहीं होता। परंतु प्रेम, करूणा के लिए तो अंग्रेज बंधु तरसते ही दिखाई देते हैं। इस्कान से जुड़े अंग्रेज बंधु स्वयं स्वीकार करते हैं कि वे यहां उपदेश और सिद्धांतों को प्राप्ते करने हेतु नहीं अपितु सच्चा् प्रेम पाने हेतु ही जुड़े हैं। इसलिये ही तो ये अंग्रेज बंधु उन महात्माओं के चरणों में बैठ कर अपने सौभाग्य मनाते हैं जिन्हें अंग्रेज़ी बोलनी भी नहीं आती। जब शिकागो धर्मसभा में स्वामी विवेकानंद अपने भाषण का आरम्भत वहां की पद्धतिनुसार लेडीज एन्डी जैन्टीलमैन से न करके अपनी संस्कृहतिनुसार सिस्टअर्स एन्ड‍ ब्रदर्स से करते हैं तो सभी मंत्रमुग्ध हो जाते हैं और सभागार में देर तक तालियां बजती हैं। कितना अंतर है किसी को ऐ महिला या बहनजी बुलाने में। हमारे यहां तो घर में काम करने वाली को भी आदर सूचक सम्बोधनों जैसें माता,काकी आदि से सम्बोधित किया जाता है जबकि अंग्रेज़ी में आदर सूचक सम्बोधनों का भी अभाव है, बाप हो या बेटा दोनों ही के लिये ‘यू’ सम्बोधन का प्रयोग होता है।
और एक खूबी हिन्दी में यह है कि ये एक ध्वसन्यात्मक भाषा है अर्थात क का उच्चाकरण क और ख का ख ही होता है। अंग्रेज़ी में ड्ब्लैयू में चार अक्षर दो मात्रायें प्रयोग होने पर भी असली उच्चाकरण ‘व’ तो सुनाई ही नहीं पड़ता। हिन्दीं की वर्णावली व्यानपक है, हर उच्चाकरण के लिए एक स्वतन्त्र अक्षर उपलब्ध है। अंग्रेज़ी में ख, च, छ, झ, घ, ठ इत्यारदि के लिये स्वतन्त्र अक्षर उपलब्ध नहीं है। अंग्रेज़ी की व्याकरण उलझी हुई है सी का उच्चारण कहीं क तो कहीं सी और कहीं च भी हो सकता है। कैमिस्ट़री, चैमिस्ट्री सब एक है। ये सवाल मत करना कि पी यू टी पुट तो बी यू टी बुट क्यों नहीं।

PostHeaderIcon संस्कृत साहित्य में समायें सात्विक, पवित्र, अध्यात्मिक स्पंदन



ये सब तो गौण बातें है प्रमुख विशेषता जोकि हमें संस्कृत का भक्त बनाती है वो है-संस्कृत साहित्य में समायें सात्विक, पवित्र, अध्यात्मिक स्पंदन और इसका सर्वमंगल भाव -

साहित्य सदैव सर्वमंगल भाव को जीता है। उसका आग्रह सबका हित है। हित भाव के बिना साहित्य नहीं रह सकता। जैसे हाथी के पैर के विस्तार में सारे जीवों के पाँव समा जाते हैं, वैसे इस मंगल भाव में सभी प्रकार के हित भाव समा जाते हैं। शिव सुंदर और सत्य होता ही। यह ‘साहित्य’ शब्द, जो शब्द अर्थ के परस्पर प्रतिस्पर्द्धी सौंदर्य से वाणी की उपासना करता है, संस्कृत भाषा का शब्द है। ‘संस्कृत’ शब्द भी अपने आप में संस्कार और सौंदर्य बोधक है। परिष्कृत या संस्कारित भाषा का नाम ‘संस्कृत’ है। संस्कार मंगल मूलक होते हैं। यह मंगल मूला देव भाषा देवताओं को तो भावित करती रही है, हजारों वर्षों से हमारी सोच-समझ को भी संस्कारित करती रही है। जितना दार्शनिक विचारधाराओं का, मानवीय मेधा का चतुर्दिक प्रसार और प्रस्रवण संस्कृत युग में हुआ उतना आधुनिक भारतीय भाषाओं की बात कौन कहे, विश्व भाषाओं में भी कदाचित नहीं हो सका। आधुनिक दर्शन-चिंतन के केन्द्र पाश्चात्य देश जरुर बन गए है, परन्तु प्राचीन काल मे भारत ही केन्द्र रहा है। इस केन्द्रत्व का साक्षी है नालंदा एंव तक्षशिला के विश्व विद्यालयों का इतिहास। सबका श्रेय-प्रेय संस्कृत का सनातन ध्येय रहा है।

संस्कृत निर्विरोध रुप से उत्तर का सेतुबंध रही है। समस्त भारतीय भाषाओं की जननी-जैसी रही है। वृहत्तर भारत के वाङ्मय का माध्यम रही। ‘वसुधैव कुटुम्ब’ के भाव को सर्वातमना जीती हुई सबको आत्मसाक्षकर आत्मीयता देती रही। उसी को वर्ग विशेष की भाषा मानकर उसके पठन-पाठन पर ग्रहण विडंबना नही तो क्या है? यह वर्ग विशेष की भाषा नहीं, अशेष की है। कांची-काशी की नहीं, समस्त भारतवासी की है। संकीर्णता की नही, उदारता की है। इसी उदारता से प्रभावित होकर दाराशिकोह ने उपनिषदों का अनुवाद फारसी मे किया था। रसखान ब्रजभाषा के रस मे पगे और मलिक मुहम्मद जायसी की अवधी में समाधी लगी।वेद वाणी समस्त जगत के जीव और नर-नारी के शिवत्व की कामना करती हुई कहती है-

ऊँ स्वस्ति मात्र उत पित्रे नो अस्तु। स्वस्ति गोभ्यो जगते पुरुषेभ्यः
विश्वं सुभूतं सुविदत्रं नो अस्तु ज्योगेव द्दशेम सूर्यम् –ऋगवेद् 1-31-4

इसी भाव का भाष्य यह श्लोक है-
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वेसन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्ददुखभागभवेत्।।

पितृपक्ष में तर्पण करते हुए भारतीय जन न केवल अपने पितरो को जलांजलि देकर उनकी तृप्ति की कामना करते हैं अपितु विश्व के समस्त जङ-चेतन के लिए तृप्ति जलांजलि समर्पित करते है।

ऊँ देवास्तृप्यन्ताम्, ऋषयस्तृन्ताम् संवत्सरः सावयवः तृप्यताम् नागास्तृप्यताम् सागरा स्तृप्यन्ताम्, पर्वता-स्तृप्यन्ताम् सरितस्तृप्यन्ताम् मनुष्यास्तृप्यन्ताम् रक्षांसितृप्यन्ताम् पशवस्तृप्यन्ताम, वनस्पतयस्तृप्यन्ताम् औषधयस्तृप्यन्ताम् भूतग्रामचतुर्विधस्तृप्यन्ताम्।

वेद-वेदांग की भूमिका के बाद पुराणों की भूमिका सर्वमंगलत्व की दिशा में कम महत्वपूर्ण नहीं कही जा सकती। शक्तिस्वरुपा देवी की प्रार्थना करते हुए भक्त- सबके सारे हितों की सिद्दि हेतु याचना करता है

सर्वमंगल मंगल्ये शिवे सवार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमो स्तुते।। -दुर्गासप्तशती

श्रीमदभागवत पुराण की मंगलकामना और भी व्यापक है। विश्व की मंगलभावना से भावित है। दुष्टों तक की निर्मल बुद्धि की कामना की गई है। प्राणियों में परस्पर सदभावना हो। मन शुभ मार्ग में प्रवृत्त हो तथा निष्काम भाव से रमा रमण में हमारा मन रमता रहे

स्वस्त्यस्तु विश्वस्च खलः प्रसीदतां
ध्यायन्तु भूतानि शिवं मिथोधिया।
मनश्च भद्रं भजतादधोक्षजे
आवेश्वयतां नो मतिरप्यहैतुकी।।

यह सर्वशुभोदय की भावधारा गंगोत्री की तरह सहस्रधार होकर संस्कृत काव्य-भूमि में बहती रही है। लोगों को भ्रांति है कि संस्कृत पूजापाठ की भाषा है। पंडितों की भाषा है। जन साधारण की समस्या सोच, सुख-दुख, चरित्र से इसका दूर का भी संबंध नहीं। आभिजात्य वर्ग की अभिव्यक्ति का माध्यम रही है। आज के संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता चुक गई है। आदि- आदि न जाने कितने भ्रम फैले हुए हैं, किन्तु गहरे उतर कर देखें तो ये सारे भ्रम, भ्रम ही हैं, सतही हैं। संस्कृत संदर्भहीन नहीं हुई है। कोई भी भाषा जब साधारण जन के बीच संवाद का माध्यम नहीं रह जाती तो उसमें ताजगी भले ही कम हो जाती है, किन्तु इससे वह संदर्भहीन नहीं हो जाती।

सबके हित की उपेक्षा करके किसी भाषा का साहित्य जी नहीं सकता। जब आदि कवि वाल्मीकि का हृदय क्रौंचवध पर रो उठा था, तब उन्होंने राम जैसे आर्तत्राण महानायक की खोज अपने श्लोकों की सृष्टि रचने के लिए की थी। इस खोज में मुनि ने सतचरित्र एवं सभी के हितभाव को केन्द्र में रखा था। नारद जी से प्रश्न करते हुए आदि कवि ने जिज्ञासा प्रकट की कि अभी इस लोक में कौन ऐसा वीर पुरुष है, जो धर्मज्ञ, कृतज्ञ सत्यसंध, दृढ़वती गुणवान, विद्वान, चरित्रवान और प्राणिमात्र का हितैषी है ? नारद मुनि ने राम का ना लिया। सबका कल्याण करना श्री राम का काम था –

कोन्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवा कश्च वीर्यवान्।
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्वाक्यो दृढ़वतः।।
चारितत्रेण च को युक्तः सर्वभूतेषु को रतः।
विद्वान कः कः समर्थश्य कश्चैक प्रिय दर्शनः।। - वा.रा.वा. कां. 2-3

व्यास यदि मनुष्य को सृष्टि का श्रेष्ठतम जीव मानते हैं, तो कालिदास प्रकृति अर्थात् प्रजा के हित को सर्वोपरि स्थान देते हैं। पग-पग पर राजा या प्रशासक को कालिदास की कविता प्रकृति रंजन का स्मरण दिलाती है। राजा प्रकृति रंजनात्, अर्थात् सब प्रकार से प्रजा को प्रसन्न रखने वाला ही राजा हो सकता है। अभिज्ञान शाकुन्तलम् के अंत में नाटककार का भरत वाक्य है कि राजा प्रजा के हित में रत रहे। विद्या में वृद्धि हो। शिव हम सबका शुभ करें –

प्रवर्तताँ प्रकृति पार्थिवः
सरस्वती श्रुतमहतां महीयसाम्।
ममापि च क्षपयतु नील लोहितः
पुनभवं परिगतशक्तिरात्मभूः।।
परम्परा से हटकर सोचने और रचने वाले करुणा के कवि भवभूति समस्त भावों के केन्द्र में करुणा को रखकर जग मंगल के लिए अपनी प्रतिबद्धता सम्प्रेषित करते से जान पड़ते हैं। अशेष मानवीय सहानुभूति का स्त्रोत करुणा ही तो है। उसमें संसार के शुभोदय का निवास है। परपीड़ा अधमताई है तो परोपकार पुण्य का पुंज। एक से बचने और दूसरे को करने के लिए करुणा चाहिए। इसी चाह की खोज भवभूति की करुणा है। पृथ्वी तनया प्रकृति स्वरूपा सीता की पीड़ा से द्रवित कवि चित्त करुणा का आश्रय लेता है। लोकाराधन के लिए सीता का निर्वासन प्रजाहित के लिए प्रकृति का पीड़न कहा जा सकता है। प्रजा मंगल के लिए और भी विकल्प खोजे जा सकते थे। इस कल्प की कसक-कचोट से पत्थर भी रो उठता है। प्रकृतिरोती है। राम रोते हैं। स्वयं राम को अपना उत्तरचरित अपराध बोध से भारी लगता है – ते ही नो दिवसाः गताः (उत्तरराम चरितम् अंक 1) इसी करुणा ने तो बुद्ध को घरबार छुड़ाया था। विश्वमंगल की साधना के लिए उसकाया था। भवभूति का कवि अपनी तथा सबकी विभूति का कारण प्रेम, करुणा और परोपकार को मानते हुए कामना करता है कि सारे संसार का शिव हो। सभी प्राणी परिहत निरत हों। दोष शांत हों। सभी स्थान के निवासी सुखी हों –

शिवमस्तु सर्वजगतां परहित निरताः भवन्तु भूतगणाः।
दोषाः प्रयान्तु शान्ति सर्वत्र सुखी भवतु लोकः।। - मालतीमाधवम् 10-25

कविता संसार का प्रतीक और पात्रों के माध्यम से मंगल का संदेश देता है। वह समस्त मानवता के प्रति स्वभावतः प्रतिबद्ध होता है। पक्षी, पर्वत, प्राणी-जड़ चेतन सभी उसकी सहानुभूति और प्रेम के पात्र होते हैं। संस्कृत इसी भाव की पूजा करती है। सर्वदया का पाठ पढ़ाती है। सबके श्रेय-पेय की स्तुति गाती रहती है। अपने कल्याण से पहले विश्व मंगल की कामना की जाती है – “शिवमस्तु सर्व जगताम्।” संस्कृत की भारत सावित्री धर्म और कर्म प्रधान है। धर्म की व्याख्या में समष्टि का मंगल विधान सर्वोपरि है, बाह्याडंबर नहीं। धर्म की अवधारणा प्रजा और समाज के धारण या रक्षण करने से अर्थवती है। वे कर्म और यम नियम, जो ध्वंस से बचाते हैं और निर्माण करते हैं, उन्हें धर्म कहते हैं। वे आचरण जो आतंक नहीं, आनन्द और अभय़ प्राणि मात्र के लिए सिरजते हैं, उन्हें धर्म की मर्यादा कहते हैं। तभी तो भारत सावित्री कहती है –

धारणादधर्म इत्याहुर्धर्मोधारयते प्रजाः।
यत् स्यात् धारणसंयुक्तं सधर्म इत्युदाहृतः। - महाभारत

ऐसी सर्व मंगल धारणधर्मी आवधारणा वाले धर्म को अर्थ, काम एवं राज्यका मूल माना गया है – त्रिवर्गोsयं धर्ममूलं नरेन्द्र राज्यं चेदं धर्ममूलंवदन्ति (महाभारत वनपर्व 414) आशय यह कि जो अर्थ धर्मार्जित नहीं होता, अनीति अन्याय व दुष्ट साधनों से अर्जित होता है, वह अनर्थकारी होता है। गलाकाट प्रतियोगिता व लूट-खसोट को बढ़ावा देता है। आदमी को आदमी नहीं रहने देता। वह धर्म से अनुशासित न रहने पर हवस का रूप ले लेता है। अनुजा तनुजा, परजा में भेद भूल जाता है। आसुरी बन जाता है। धर्म रहित राज्यकी भी यही दशा होती है। हस्तिनापुर का राज्य उसे छोटा लगता है। जो प्राप्त भाग है उसका विकास भूलकर काश्मीर की रट लगाने लगता है। मानों काश्मीर मील जाने पर उसकी कोई इच्छा शेष नहीं रहेगी। यह देश हमेशा धर्म को कमोबेश केन्द्र में रखता चला आया है। लंका जीतकर लंकावासी को और बंगलादेश बंगलावीसी को सुशासन के लिए सौंप दिये गये। यह भारतीय धर्म का मंगल भाव है जिससे हमारा जीवन, हमारे आचार-व्यवहार और हमारी राजनीति अनुशासित है। यह धर्म आध्यात्मिकता की ऊँचाई पर पहुँचकर जीवन के बहुविध अच्छे कर्मों को ही शिव की आराधना मानता है। इस शिव स्तुति का यही विशद आशय है –

आत्मात्वं गिरिजामतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहम्
पूडा ते विषयोपभोगरचना निंद्रा समाधिस्थितिः।
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो
यतयतकर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्।। - शंकराचार्य शिवमानसपूजा

तो हम देखते हैं कि अंग्रेजी राजसिक तो संस्कृत सात्विक भाव की सुगन्ध् फैलाती है। उदाहरणार्थ- अंग्रेजी की एक लोकोक्ती ‘‘हैल्थ इज् वैल्थ’’ जिसके साथ एक आसुरी सम्पदायुक्त‍ दैत्या‍कार पहलवान का चित्र लगा होता है उसे देखि‍ये या फिर हमारे यहां की जाने वाली सबके कल्याण की प्रार्थना पर दृष्टि डालिये-

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत् ।।
(सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें, और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े ।)

किसी और के बारे में कहना ही बेमानी होगा, जब हमारे राजनेता जो देश के खेवनहार हैं वे स्वयं ही हिन्दी का उपयोग करने में अपमानित महसूस करते हैं। कुछ अपवादों को छोड़कर यदि देखा जाए आज उच्च वर्ग हिन्दी बोलना तौहीन मानता है। आज जो हिन्दी बोलने में अपने को अपमानित महसूस करते हैं कल वो हिन्दू कहलाने में भी स्वयं को अपमानित महसूस कर सकते हैं। ऐसे में यह सोचनीय विषय है कि तमाम विसंगतियों के बावजूद राष्ट्र भाषा को उसका उचित स्थान कैसे दिलाया जाए। मेरे विचार से हिन्दी दिवस का आयोजन तभी सार्थक सिद्ध हो सकता है, जब प्रत्येक देशवासी इसे अपनी अंतरात्मा से अपनाने व उचित सम्मान दिलाने का संकल्प लें।

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