मन्जिले थी दूर लेकिन
रास्ते अन्जान थे
जिस गली से भी मै गुजरा
लोग सब हैरान थे.
देखा नही ...सोचा नही कुछ
चलता रहा....चलता रहा
अपनी ही धुन मे
ख्वाव दिल मे
पलता रहा...पलता रहा
पसीना भी बहा
सब कुछ सहा
स्वाभिमान पर
ना झुका.
इन्तिहा अब
हो गयी है
किस्मत ही अपनी
सो गयी है
किससे कहे
किसकी कहे
जख्म गहरे - दर्द लेकिन
सहता रहा ....सहता रहा.
दर्पण मे, मै हु
या है ओर कोई
धुधला है चेहरा
सूरत्(soul)है वो ही
आन्सू भी सूखे
सपने भी टूटे
शिकवा भी खुद से
करता रहा.....करता रहा
अति-उत्तम
धन्यवाद
आसमान साफ है,चाँदनी होनी चाहिए। हर दिल मेँ मुहब्बत की रोशनी होनी चाहिए। हर ओठो पे हो एक खुसनुमा मुस्कान और नैनोँ मेँ थोड़ी नमीँ होनी चाहिए। मथुरा प्रसाद वर्मा