सत्‍य और अहिंसा में से अगर एक को चुनना हो तो प्रथम आप किसका चयन करेगें?

PostHeaderIcon सत्य


अगर इन दोनो में से ही चुनना होगा तो मै सत्य का चुनाव करूंगा |
आप क्या सोचते है?

PostHeaderIcon प्रथम अहिंसा का ही चयन


अकबर बादशाह के दरबार में बनारसी दास की सच बोलने के लिए बड़ी साख थी। बादशाह ने एक पक्षी हाथ में लेकर बनारसी दास से पूछा- पक्षी जिन्‍दा है या मृतक। बनारसी समझ गया अगर मैं जिन्‍दा बोलता हूँ तो बादशाह मुझे झूठा साबित करने हेतु पक्षी की गर्दन मरोड़ देगा। बनारसी ने कहा पक्षी मरा है। बादशाह ने पक्षी को उड़ा दिया और बोला- बड़े सत्‍यवादी बनते हो! बनारसी ने कहा- अगर मैं सच बोलता तो आप उसे मार देते। अपने को सत्‍यवादी सिद्ध करने की अपेक्षा एक जीव के प्राण बचाना मैं श्रेष्‍ठ समझता हूँ।
ऐसे ही शास्‍त्रों में भी आख्‍यान आया है कि एक शिकारी मृग का पीछा करते एक तपस्‍वी के पास पहूंचा और उनसे पूछा- मृग कौन सी दिशा में गया है? तपस्‍वी सोचने लगा कि सत्‍य बताता हूँ तो मृग के प्राण जाते है। 'अरे आप तो सत्‍यवादी हैं जल्‍दी बताओ' शिकारी ने कहा! तपस्‍वी ने हाथ से उस दिशा की ओर इशारा कर दिया, जिस ओर मृग था। ''इस तपस्‍वी के हाथ काट दिए जाए'' धर्मराज ने निर्णय दिया- अपने को सत्‍यवादी सिद्ध करने के लिए इन्‍ही हाथों से इशारा करके इसने एक जीव हत्‍या में सहयोग दिया था।
इन उदाहरणों से शिक्षा मिलती है कि साधारण मानव को प्रथम अहिंसा का ही चयन करना चाहिए। सत्‍य का प्रथम चयन तो केवल वो महापुरूष कर सकते हैं, जिनके लिए जन्‍म-मरण, लाभ-हानि, यश-अपयश में कोई अन्‍तर नहीं होता। जैसे भगवान श्री कृष्‍ण ने अर्जुन के द्वारा सत्‍य का प्रथम चयन करवाया। आपुन लोग तो थोड़े से स्‍वार्थ के लिए ही झूठ का सहारा लेने में नहीं कतरातें, फिर भी कहलाना सत्‍यप्रिय चाहते हैं।
सत्‍य ईश्‍वर है तो अहिंसा गुरू। गुरू के बिना जैसे ईश्‍वर को नहीं पाया जा सकता ऐसे ही अहिंसा के बिना सत्‍य तक नहीं पहुंचा जा सकता। जय सच्चिदानंद जी !

PostHeaderIcon सत्‍य या अहिंसा


अहिंसा के बिना सत्‍य तक नहीं पहुंचा जा सकता अतः चुनना हए तो प्रथम अहिंसा का ही चयन करेगे

PostHeaderIcon वाह भाई...


वाह भाई मान गये आपकी बात|
मैने तो केवल यह सोचा था की मुझे इन दोनो मे से क्या कम कठीण लगता है| तो वह है सत्य, बाकी रही बात अहिंसा की तो वह चिज शायद अगले जनम मे सिखनी पडेगी|

मै हिंसा वादी नही हूं| विकास के लिये शांती की जरूरत होती है| लेकिन मै सृजनशांती और स्मशानशांती मे फरक जाणता हूं|

आपकी बात पसंद आयी ,और दृष्टांत भी |

PostHeaderIcon वह समय अलग था |


मित्रवर्य,

मेरी मन यह कहता है की मुझे अहिंसा को प्रथम स्थान देना चाहिए |

मै कोई दृष्टांत या कथा नही जाणता लेकीन सत्य अहिंसा का स्थान कभी ले नही सकता क्योंकी सत्य से एक बार अगर किसी की भी जान चली जाये तो वह हम वापस नही ला सकते पर एक असत्य से होने वाले पाप का प्राश्चित हम आगे चल कर भी कर सकते है |

राज

PostHeaderIcon अच्‍छा


अच्‍छा चर्चा को आगे बढ़ाते हैं कि अगर परिस्थिति ये हो कि अंहिसा और प्रेम में से एक का चयन करना हो तो आप इन में से किसे प्राथिमिकता देंगे?

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