महात्‍मा गांधी या शहीद भगत सिंह


एक का मार्ग शान्ति का तो दूसरे का क्रान्ति का! आपको कौन सा मार्ग पसन्‍द है?

क्रांती का उद्येश्य...

क्रांती का उद्येश्य हमेशासे शांती ही रहा है| किसी भी क्रांती को अशांतता, अन्याय तथा शोषण की पृष्ठभुमी पर ही उदय होते हुये देखा गया है| ऐसा कभी नही हुवा की सब तरफ शांती और खुशहाली है और अचानक से क्रांती हो गयी|

क्रांती होती है शोषणपर आधारित समाजव्यवस्थाको पलटनेके लिये| समातामुलक समाज की निर्मीतीके लिये जिसमे सबको समान संधी मिले| क्रांती का मार्ग शांती की हि ओर जाता है|

नीलकांत

देश कॊ ना बाटें...

संभवतः नीलकान्त जी क्रान्ति की परिभाषा में संशय रखतें हैं। क्रान्ति शान्ति के लिए है उसी तरह से शान्ति से क्रान्ति संभव है। अतः यहां तुलना का प्रश्न ही नहीं है। एक गुजारिश है कि राष्ट्रपिता गान्धी एवं शहीदे आजम भगत सिंह में तुलना कर के देश कॊ ना बाटें।

सुनील डॊगरा जालिम
+91-98918-79501

मेरा कहना...

सुनील डोगराजी ,

मैने क्रांती का उद्देश्य शांती बताकर क्रांती और शांती एक ही अंतिम धेय्य के प्रति की गयी आरधना है यह बताया है| मेरे हिसाब से गांधीजी और भगतसिंहजी का धेय्य तो एक् ही था| मार्ग भलेही उपरी स्तर पर भिन्न हो लेकीन दोनो का अंतिम धेय्य तो एक ही था |

केवल क्रांती मार्ग मे विश्वास रखने वाले शांती का मुल्य कम आंकने की भुल न करे और केवल शांती से चलने वाले क्रांती को अवमुल्यांकीत न करें |

इसमे देश को बांटने की बात कहां है? निसर्ग संतुलन चाहता है | शांती और क्रांती नैसर्गीक है, स्वाभाविक है|केवल अपने हठ के लिये इन दोनो मे से किसी एक को चुनना और अंत तक खिंचना |ऐसा कुछ किया तो प्रकृती मे विकृती का निर्माण हो जायेगा ऐसा मुझे लगता है|

नीलकांत

र्शीषक उपयुक्त नहीं..........

कई दिनॊं के अत्यन्त गंभीर चिन्तन के बाद आज मैं फिर यहां हूं। नीलकान्त जी ने बडी ही चतुरता के साथ बात कॊ उलझा दिया। अपने तर्कॊं से उन्हॊने पाठकॊं का नैतिक समर्थन भी पा लिया परन्तु फिर भी एक प्रश्न शेष है।
गाधीं और भगत सिहं दॊनॊं ही देश सेवा में लगे थे। अतः पुनः मैं यही कहूंगा कि र्शीषक उपयुक्त नहीं हैं।

प्रिय

प्रिय सुनील जी,
देश कॊ ना बांट नहीं रहें जी, छांट रहें हैं विभिन्‍न विचारधारा के व्‍यक्तियों को।
महात्‍मा गांधी या शहीद भगत सिंह दॊनॊं ने ही देश की सेवा की परन्‍तु उनके सेवा करने के ढंग में अन्‍तर था।
यह चर्चा उनके मार्ग को लेकर है नाकि उनकी महानता की तुलना करने हेतु

बात तो सही है|

गांधीजी और भगतसिंह दोनो का देश के लिये योगदान तुलना के परे है और हम लोग कौन होते है की उनमे से किसका योगदान बडा या छोटा कहने वाले? सच बात तो यह है की किसी भी युगपुरुष की किसी और से तुलना नही की जानी चाहिये |

उपर पुछा गया सवाल इन दो महान हस्तीयों के व्यक्तीगत जीवनसे संबंधीत न होकर इन दोनों ने जो अलग अलग राह दिखायी है उसके बारे मे अपना व्यक्तीगत मत पुछने के बारे मे होगा यह मान कर मैने पहली प्रतिक्रिया दी थी|

मुझे क्या पसंद है और मै क्या सोचता हूं , यही सबके सामने रखना था | इसमे अगर देश का प्रश्न दिखाई नही दिया| और हां आम तौर पर यह सोचा जाता है की यह दोनो परस्पर विरोधी थे, लेकीन मै ऐसा नही मानता| मैने क्रांती और शांती के बारे मे जो लिखा था वह तो उपर दिया ही है|

गांधी जी

गांधी जी तथा भगतसिंग जी

मेरे नजर से देखो तो यह दोनो उस समय के भारतीय समाज मन मै चल रही उथल-पुथल के स्वरुप है |

गांधीजी का मार्ग एक नया मार्ग था | तथा भगतसिंग का मार्ग सदीयोंसे प्रस्थापित था |
हर समाज का जो युवा वर्ग है वह उतेजना से भरपुर तथा आत्मविश्वास से लबरेज होता है तथा जो बुजुर्ग वर्ग होते है वह हरकाम अपने अनुभवोंको साक्षी रखकर करना चाहते है | यह मुलभुत फरक था गांधी तथा भगतसिंग मैं |
गांधी वैचारिक क्रांती पे भरोसा कर के अहिंसा के पथ पे चले |
भगतसिंग अपनी ताकत पर अपने तथा जोश पर भरोसा करके क्रांती के पक्ष में चले |

लेकिन,
विचार करने योग्य बात यह है की गांधी जी को महान उनके विचारोंने बनाया | भगतसिंग महान अपने कार्यों से बने| एक समय यह भी था की गांधीजी के अनुयायी युवा कार्यकर्ता भगतसिंग की बोली बोलने लगे थे |

क्योंकि आप कितने भी अहिंसावादी रहे आप सर्व प्रथम क्षत्रिय है जब आप पर कोई हमला करे तो आप स्वभाविक क्रियाओंसे ही हिंसा के लिए तयार होते है बाद मै आप अहिंसा के बारे मे सोचते है |

रक्तक्रांती यह मानव जाती के आरंभ से ही मानव से जुडी है यह मानव जाती का मुल मंत्र है | जब मानव जाती वन मै थी तब भी , जब हम समाज मै रहने लगे तब भी क्योकि ताकतवर हमेशा कमजोर पर हावी रहता है |

जब हम भारतीय स्वतंत्रता की बात करे तब हमे यह याद रखना चाहीए कि आझादी ना गांधी ने दी ना भगत ने यह तो मानव जाती का स्वभाव ही है की कोई हम पे राज करे तो ठीक लेकिन जब राज करने वाला पिडा देने लगे तो विद्रोह करना स्वाभाविक है तब कही जा के गांधी था भगत की बारी आती है समाज को विद्रोह का सही तरीका तथा रास्ता दिखाने का |

गांधीजी तथा भगतसिंगजी यह भारतीय समाज के दो द्विपस्थंभ है जो हमे मार्गदर्शन करते है यह दो विपरित विचारधारा यें है लेकिन लक्ष्य एक ही है आझादी|

राज

शहीद तेरी मौत पर लगेगे हर बरस मेले

यह तुलना निरथर्क ही नही बेमानी है, कि गान्धी जी ओर् शहीद भगत सिघ मै से कोन महान है.

दोनो ने उस देश्काल परिस्थिति उनुरुप जो भि किया उचित किया, हम लाख कोशिशो के बाद भि उन वास्त्विकतो क अनुभव नहि कर सक्ते जो उन महान लोन्गो ने झेले ओर निभये,

हमरा कर्त्व्या सिर्फ ये न्बन्ता है कि हम आज के समय काल अनुसार वो करे जो आव्स्यक है ओर जिस्के लिये हमारे उन महान पुन्य आत्मओ ने अप्ने प्रनो क उत्सर्ग कर दिया

जय हिन्द, जय भारत, जय हो अमर बलिदानी-शहीदो की