सब भगवद्लीला है।


तुम पर भगवान की कृपा नित्य-निरन्तर बरस रही है। तुम्हे सदा सब ओर से नहला रही है। ऐसा कोई क्षण नहीं जब तुम उनकी कृपा से वंचित रहते हो। रहते भी कैसे? तुम उनकी प्यारी से प्यारी रचना जो ठहरे। सचमुच, विश्‍वास करो, जबसे तुम हुए, न जाने किस अज्ञात काल से,तभी से उन्होनें तुम्हें अपनी गोद मे ले रखा हैं। तुम पुछोगे, ये जो ज़लन हो रही है, यह जो रात-दिन का शोक-संताप-चिंता हैं, इसका क्या कारण है?
इसका उतर यह हैं-न तो यह ज़लन है, ना शोक-संताप-यह सब उनकी लीला हैं।
तुम जो इसका अनुभव कर रहे हो और पूछ रहे हो ये भी उनके लीलाभिनय का ही
एक अंग हैं। तुम्‍हारा ज्ञान और अज्ञान, तुम्‍हारा सुख और दु:ख, तुम्‍हारी तृप्ति-अतृप्ति, तुम्‍हारी शान्ति-अशान्ति यहां तक कि तुम और मै-सभी कुछ उनकी लीला हैं। तुम्‍हारी यह सुख की कामना, शान्ति की चाह-सब उनका ही खिलवाड़ हैं। यह जो सृष्टि दीख रही है, इसमें जो शान्ति-अशान्ति की लहरें लहरा रही हैं।यह सब भी उनकी लीला ही हैं। कभी भयानक और कभी सौम्‍य-रात और दिन की भाँति एक ही लीला की दो दिशाएँ हैं।
यहां कुछ भी विपरीत नहीं होता। जो होना चाहिये, जैसे होना चाहिये, वैसे ही हो रहा हैं। जो होता हैं होने दो-किसी के रोकने से रूकेगा भी नहीं। तुम तो बस अपने आपको उनकी मंगलमयी इच्‍छा के प्रवाह में डाल दो। किसी खास स्थिति की कल्‍पना छोड़कर निश्‍चिंत हो जाओ। अब भी उसी प्रवाह में पड़े हो, परन्‍तु तुम्‍हें पता नहीं हैं, इसी से भयानक और सुन्‍दर का भेद दीखता हैं। लीलामय से प्रार्थना करो- तुम्‍हारी असली आँखें खोल दें।
फिर प्रत्‍यक्ष देख सकोगे कि तुम न उनसे कभी अलग थे, न अब अलग हो, न आगे ही कभी अलग हो सकते हो। तुम तो उनकी अपनी ही रचना हो, उन्‍हीं के स्‍वाँग हो, उन्‍हीं की इच्‍छा से, उन्‍हीं की प्रेरणा से, उन्‍हीं के खेलाने से खेल रहे हो। आनन्‍द! आनन्‍द! आनन्‍द!