प्रेरक प्रसंग - छोटा या बड़ा
प्रेषक आजाद ( 10 जुलाई, 2007 - 23:05 ) ।
मगनबाड़ी आश्रम में महात्मा गाँधी ने एक बार यह योजना बनाई कि सबके जूठे बरतन बारी-बारी से दो-तीन व्यक्ति मांजा करें । इससे आश्रमवासियों में प्रेम भाव बढेगा तथा एक दूसरे के बर्तन साफ करने से जो घृणा होती है उससे भी छुटकारा मिलेगा ।
जब उन्होंने इस कार्य का महत्व आश्रमवासियों को बताया तो उनके गले यह बात नहीं उतरी । सभी आश्रमवासी कहने लगे – सबके जूठे बरतन मांजने में व्यवस्था में व्यवधान होने का डर है ।
गाँधी जी ने कहा – व्यवस्था को सुचारू बनाये रखना ही तो मेरा कार्य है । इतना कहकर वे और बा दोनों बरतन मांजने लग गये । अन्य आश्रमवासियों ने जब देखा तो उन पर अच्छा प्रभाव पडा और वे भी उनके साथ लग गये ।
गाँधी जी ने कहा – इस काम को लोग छोटा समझते हैं । जबकि कोई भी काम न छोटा होता है न बड़ा । छोटा या बड़ा तो दृष्टिकोण ही होता है ।
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