मैं तुम्हारा खत आख़िरी जाने किस के हाथ आऊँ
प्रेषक गिरीशबिल्लोरे ( 18 जुलाई, 2007 - 01:15 ) ।
मैं तुम्हारा खत आख़िरी जाने किस के हाथ आऊँ
तुम पडो इक बार मुझको इक नया संचार पाऊं !
कौन किसकी वेदना पडने चला,
कौन ऊँचे श्रंग पर चडने चला!
कहते हैं गंगा उसे अरु पूजते भी
पीर गिरि की कौन है पड़ने चला !
सोचता हूँ हाल गिरि का पूछ आऊँ .
और परवत से आभार पाऊं..?
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हाँ ,समंदर भी अश्कों से भरा है
और वन! दर्द से ही तो हरा है...!
पीर के बिन इस धरा पे कुछ नहीं
पीर बिन वो गवैया बेसुरा है...!
पीर मेरी प्रेयसी है...!
जाऊं.... मैं..... अभिसार आऊँ...?
**गिरीश बिल्लोरे मुकुल**
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मैं तुम्हारा आख़िरी ख़त जाने किस के हाथ आऊँ
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