कैद


आस्वाद लेते फ़ल-फ़ूलों का आकाश में विहंगरत पंछी बहुरंगी
पंख मखमल से हे मेरे मनके स्वच्छंद सुकुमार करते हो स्मृती-
गगन को पार अब-सो गया तुम्हारा सुरा-स्वर स्वर्ण-पिंजडेमें
वियोग की दशामें क्या कर पाओगे?
खो जाओगे विगत यादो में शेष रहा प्रिय - प्रणयमें .
आवाज देनेकी उत्कंठता और- क्षुब्ध एक कंपनसा निद्रितप्रिया के अधरोमें
---### अशोक लंगडे ###