शरणागति


एक दिन मन बड़ा अशान्‍त था। विचारों की लहरें बहा कर ना जानें किधर ले जा रही थी मन को। चिंता के समुन्‍द्र में डूबता जा रहा था- डूबता जा रहा था। क्‍या जो मैं कर रहा हूं उचित है या अनुचित, जीवन की गाड़ी सही दिशा में आगे बढ़ रही है या गलत दिशा में? तभी मेरी आंख लग गई, सपने में एक सन्‍त कह रहें थे- जब रात को शयन करने जाओं तो दिन भर के सभी शुभ-अशुभ कर्मो को भगवान जी को अर्पित कर दिया करों। और ऐसा अनुभव करों कि सिर से कोई भारी बोझ उतर गया है। बोल-बोल कर कहों कि 'भगवान जी, मैं अपने सभी अच्‍छें-बुरें कर्म आपके श्री चरणों में अर्पण करता हूं, मैं आपकी शरण में हूं, अब मेरा उत्तरदायित्‍व आप पर है और ऐसा अनुभव करों कि सिर से कोई भारी बोझ उतर गया है। पहले-पहले भले झूठमूठ में ऐंसा करने का अभ्‍यास करों।
झूठमूठ खेलें सचमुच होईं-सचमुच खेलें विरला कोईं।
जो कोई खेलें मन चित्त लाईं-बनत-बनत बन ही जाईं।।
सन्‍त जी ने एक दृष्‍टांत सुनाया- एक बकरी को सिंह ने धर दबोंचा। बकरी सिंह से बोली-मैं आपकी शरण पड़ती हूं महाराज, मेरे प्राण मत लो। आप जंगल के राजा हैं और राजा लोग तो अपनी शरण में आए शरणागत की रक्षा के लिए सदैव तत्‍पर रहतें हैं। महाराज शिबि ने शरण में आए कबूतर की रक्षा हेतु अपने शरीर की बोंटी-बोंटी कुर्बान कर दी थी। सिंह ने कहा- मै तुझें निर्भय करता हूं। तेरे शरीर पर मेरें पंजो के निशान पड़ चुकें हैं। अब सारे जंगल के जानवर तेरा सम्‍मान करेंगे और तेरी सहायता करेंगे। हाथी काका ने बकरी को पीठ पर सवार कर लिया और बकरी को हरी-हरी पत्तिया खानें को दी।
'सन्‍त जी ने आगे फरमाया' अब तुम्‍हारी इच्‍छा है-या तो भगवान जी की शरण ग्रहण कर के सारा उत्तरदायित्‍व उन को सौंप कर निश्चिंत हो जाईयें या फिर स्‍वयं को कर्ता मान कर चिंता के समुन्‍द्र में डूबकियां लगातें रहियें।