आनन्‍द की खोज


मानव इस संसार रूपी मरूभूमि में बार-बार भागता है, दौड़ता है, भटकता है और थक-हार जाता है। कहीं कोई सारवस्तु उसे नहीं मिलती। अनेकों संकल्प-विकल्पों से लालायित होकर भागता है और अंततोगत्वा वहां पहुंचने से पूर्व ही उसे आभास हो जाता है कि यह आनंद नहीं है। यह जागृति ही जीव का अन्वेषण मार्ग है।

इसी का नाम ज्ञान है। जब इन्द्रिय और मन का बाहरी प्रभाव काम नहीं कर पाता, उस समय लक्ष्य खुल जाता है। यही लक्ष्य का उन्मेष है। साधक की दृष्टि अपने सामने लक्ष्य रूप में आनंद को प्राप्त कर लेता है। सब कुछ जीव के अंतर में घटता है। यह बाहर की घटना नहीं है। वह बाह्य जगत से अंतर्जगत में आ जाता है। जीव रूपी पथिक अब तक जो खोज रहा था, हर क्रिया में उसे ढूंढ़ रहा था, पर सफलता नहीं मिल रही थी। अब उसे अंतर्दृष्टि के साथ-साथ अपने हृदय में प्रत्यक्ष देखता है। यह आनंद ही लक्ष्य होता है। यह आनंद ही सद्गुरु है। यह आनंद ही इष्ट है और यह अंत: आनंद ही जगद्जननी रूपा है। यह आनंद प्रकृति रूपा है। यह आनंद शिव रूप है। अत: दृष्टि खुले बिना इस अपरोक्ष ज्ञान का दर्शन नहीं हो सकता। जिसको जो प्रिय हो, उसी का साक्षात्कार यहां हो जाता है। जिसको जो इष्ट हो, उसकी पूर्णता समष्टि रूप में उसके सामने प्रकट हो जाती है।
साधकों का साध्य, योगियों का महापथ, भक्तों के संपूर्ण समर्पण का यही भाव प्रकाश है। प्रभु प्रेमियों का प्रेम सागर यही है, जहां मननोचित प्रेम उन्मेष होकर आत्मीय प्रेम बन जाता है। लक्ष्य की प्राप्ति होते ही साधकों को आनंद का अनुभव होता है। यह सही है कि लक्ष्य तक पहुंचने और किसी नए लक्ष्य के अभाव में उत्पन्न आनंद की स्थिति योगियों को चरम आनंद प्रदान करती है। वास्तव में योगी प्रकृति स्वरूपा महामाया मां केदर्शन प्राप्त करकेही मुग्ध हो जाते हैं।
साधना रूपी कर्म यदि तीव्र हो, तो रूप दर्शन ही नहीं होता अपितु ज्योति दर्शन के साथ ही ब्रह्म ज्ञान सिध्द हो जाता है। किसी दुखी को सांत्वना देना, किसी रोते हुए इंसान के आंसू पोंछना, किसी गिरे हुए को उठाना- देखने में ये सब भले ही गौण लगते हैं लेकिन वास्तव में भौतिक सफलताओं में कहीं बढ़कर हैं। जब मानवता प्रकृति की सेवा करती है तभी प्रकृति भी मानवता को उसका फल प्रदान करती है। जब हम पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों की सेवा करते हैं, तो बदले में वे सब भी हमारी सेवा करते हैं।
दूसरों के प्रति यही समझ रखकर जब हम प्यार और विश्वास से पेश आते हैं, तभी हमें अंत:आनंद की प्राप्ति होती है। यह जीवन में खुशी एवं शांति का प्रतीक है। दूसरों को सुख प्रदान करने के बाद ही मन में ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना मन में पैदा होती है।