ओशो को दर्शनशास्त्री ना कहकर तर्कशास्त्री कहना उपयुक्त रहेगा। ना उनकी कोई राह, न उनका कोई सिद्धांत, बस तर्क से अपनी बात को सही सिद्ध करना मात्र उनका लक्ष्य लगता है। ''आज एक विचार प्रकट किया तो कल अपने ही विचारों को अपनी वाकपटुता से धराशायी करना'' इस उपक्रम को मानसिक व्यायाम कहना कदाचित गलत न होगा। मैं स्वीकार करता हूं कि वो अनुपम प्रतिभा के धनी थे परन्तु प्रतिभावान महान भी हो ये आवश्यक तो नहीं!
महापुरूषों के हृदय में लोकहित समाया रहता है। परन्तु ओशो के कथनानुसार अगर जीवन बनाया जाए तो आत्मा पतन के गर्त में समा जाए। भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण, गुरूनानक, सन्तकबीर, तीर्थकरमहावीर, महात्माबुद्ध, ईसामसीह, मुहम्मद साहिब के अन्य उपदेशों में भले ही यदकिंचित अन्तर हो सकता है परन्तु मन के दमन हेतु सबने ही कहा है। पतान्जली तो मनोनिग्रह को ही योग कहते है। परमात्मा से योग चाहते हो तो मन को नियन्त्रित करों। परन्तु ओशो का राग सबसे अलग ''सम्भोग से समाधि'' वाह-जन्मों से और क्या करता रहा है ये जीव? सूकर-कूकर सभी यही कर रहे है किसकी लगी समाधि?
वासना रूपी आग में जितना घृत डालो आग और भड़केगी, नाकि शान्त होगी! और सुनिए जनाब- 'ओशो' विवाह को समाजिक कुरीति बतातें हैं, तो क्या पशुओं की तरह केवल वासनातुष्टी कर लेना मनुष्य की गरिमा के अनुकूल होगा? हमारी भारतीय संस्कृति में मानव जीवन चार आश्रमों में विभाजित किया गया है। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास । धर्म का पालन तो चारों में ही किया जाता है। ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ, संन्यास आश्रमों में रहने वालों के निर्वाह का प्रबन्ध गृहस्थ ही करता है। इसलिए गृहस्थाश्रम बहुत महत्वपूर्ण है। भारतीय संस्कृति में सदगृहस्थ के रूप में अपने कर्तव्यों और दायित्वों का निर्वहन भली प्रकार करते हुए धर्माचरण करने की परंपरा रही है। कष्टमय संसार में आवागमन से छुटकारा पाने के लिए मोक्ष की कामना की जाती है। ताकि आत्मा का उत्थान हो जाए और वह उस अनंत सत्ता यानी परमात्मा में उसी प्रकार लीन हो जाए जैसे कि संध्या के समय सूर्य की किरणें अस्तांचल में वापस लौट जाती हैं। गृहस्थाश्रम इस प्रक्रिया में बाधक नहीं अपितु सहायक सिध्द हो सकता है। बशर्ते धर्मानुकूल आचरण किया जाए।
''भारतीय संस्कृति या ओशो'' आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें, धन्यवाद!
प्रिय आजाद जी,
मैं निश्चय पूर्वक कह सकता हूँ कि आपने अभी तक एक भी ओशो की पुस्तक नहीं पढ़ी है।
आप अगर यह कह्ते की मैं ओशोदर्शन समझ नही पाया तब भी आप को ईमानदार आलोचक समझा जाता परन्तु ओशो की पुस्तक नहीं पढ़ी यह आप ने गलत कहा है।
चलो आपने अपनी प्रतिक्रिया तो दी धन्यवाद!
आजाद
प्रिय आज़ाद जी !!!
यदि आप स्वयं को समझते हैं, तो ही ओशो को समझ सकते हैं । ओशो किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं, ओशो संपूर्ण अस्तित्व की अभिव्यक्ति हैं । ओशो शाश्वत हैं, ओशो ने किसी बंधी-बंधाई और किसी संकीर्ण विचारधारा को कभी अभिव्यक्त नहीं किया । जब आप कहते हैं कि भारतीय संस्कृति ,तो आपने स्वयं को अस्तित्व से अलग कर लिया, अस्तित्व में कोई रेखाएँ नहीं हैं, जहाँ मनुष्य को भारतीय या पाकिस्तानी के बीच बाँटा जा सके । जब आप भारतीय संस्कृति को श्रेष्ठ कहते हैं, तो आप में अन्य संस्कृतियों के प्रति वैर भाव आ ही गया । आप ने स्वयं का मंडन और दूसरे का खंडन कर ही दिया । लेकिन अस्तित्व में कहीं कोई दूसरा है ही नहीं, सबका अस्तित्व अद्वितीय है । इसके लिए स्वयं की समझ और अस्तित्व का गहन स्वीकार भाव चाहिए ।
ओशो ने कभी नहीं कहा कि उनके अनुसार जीवन बनाया जाए । जीवन तो अस्तित्व की एक अनुपम भेंट हैं । हम सबमें वह खिलता है ।अस्तित्व किसी दमन को नहीं जानता । वह तो बस होना है । लेकिन मनुष्य अपने होने के अलावा कुछ और बनने की कोशिश करता है । इस और बनने में ही दुख है । ओशो स्वयं को जीते हैं, वे किसी दूसरे जैसे होने की कोशिश नहीं करते । यही उनका सौंदर्य है और यही उनकी सीखावन है, कि व्यक्ति-व्यक्ति स्वयं की तरह जिए । अस्तित्व ने जो अद्वितीयता उसमें दी है , उसका सम्मान करे । अस्तित्व कभी कार्बन का़पी नहीं बनाता ।
लेकिन हम किसी विचार संस्कृति में बंध कर उस अस्तित्व ने जैसा हमें बनाया है,उससे इतर हम कुछ और होकर जीना शुरु कर देंगे तो अवश्य ही हम विकृत हो जाएँगें । यह संस्कृति नहीं विकृति है ।
ओशो ने उन सभी राजनीतियों और राजनीतिज्ञों की निंदा की है, जो मनुष्य को किसी भी प्रकार से गुलाम बनाती है । हमारी सभी समाज व्यवस्थाएँ मनु से लेकर चाणक्य तक और फिर दयानंद सरस्वती तक कहीं न कहीं मनुष्य को गुलाम बनाए रखने की नीति को पोषित करती हैं या दूसरे अर्थों में इन सबका दर्शन स्वयं का मंडन और दूसरे का खंडन करता है । यदि संपूर्ण अस्तित्व को किसी ने समझा है और जाना है तथा उसके अनुरूप जीवन को संवारने की कोशिश की है तो वे हैं : ओशो । अन्य सभी की दृष्टियों में संकीर्णता है, क्षेत्रीयतावाद है, देशवाद है, महानता के गीत हैं । लेकिन महानता किस से । जो बाँटता है वही महानता के गीत गाता है । जो सर्व स्वीकार करता है ,उसमें हिंसा या संकीर्णता का अंश नहीं हो सकता ।
फिर आप योग की बात करते हैं ।कि पतंजलि ने मनोनिग्रह की बात की है । आप का मनोनिग्रह से जो अर्थ है : उसका अर्थ मन का या इंद्रियों का दमन है । लेकिन पतंजलि या ओशो का अर्थ यह नहीं है । जब कभी आप अस्तित्व के साथ लय प्राप्त कर लेते हैं, तो आप मन और इंद्रियो के पार चले जाते हैं, उस समय इंद्रियाँ आपके वश में स्वत: होती हैं, न कि उनका दमन होता है । योग का अर्थ ही है जहाँ द्वैत न रहा । जहाँ मेरे और तेरे का फेद मिट गया । जहाँ ससीम का असीम से मिलन हो गया । इस असीम की अनुभूति में ही परम संस्कति का जन्म होता है । जिसका अनुभव कभी भारतीय ऋषियों को रहा है । जब उन्होंने कहा कि ॐ पूर्णमिद: पूर्णमिदं ....
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फिर जब आप विवाह की बात करते हैं, तब आप फिर अपनी बंधी-बंधाई धारणाओं का पोषण कर रहें हैं । विवाह सामाजिक रूप से व्यक्ति को परिवार में बाँधे रखने की संस्था है । जिसमें व्यक्ति के सहज विकास के मार्ग अवरुद्ध होते हैं । आज यदि आप देखेंगे तो विवाह को बचाने की कोई आवश्यकता नहीं है । ओशो ने बहुत बार कहा है कि व्यक्ति विवाह के कारण स्वयं को बंधन में फंसा हुआ पाता है... उसे उस से बाहर निकलने का आसान तरीका नजर नहीं आता । ओशो ने स्पष्ट कहा है कि जहाँ प्रेम न हो और दो व्यक्तियों का एक साथ रहना सिवाए एक समझौते के कुछ न बचा हो, तो उन्हें अलग हो जाना चाहिए । बजाए एक दूसरे की स्वतंत्रता को नुकसान पहुँचाए । केवल एक स्वतंत्र व्यक्ति ही दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता का आदर कर सकता है । ओशो ने कहा है कि विवाह में प्रवेश की अनुमति हरेक को नहीं होनी चाहिए, केवल दो प्रेमी ही, अच्छे से जानपहचान कर ही विवाह में प्रवेश करें । विवाह बंधन नहीं बल्कि प्रेम का परिणाम होना चाहिए ।
बिना धर्म को जाने धर्म का आचरण नहीं हो सकता । और धर्म क्या है ? जो धारण करने योग्य हो,वही धर्म है । हम सब कुछ धारण कर सकते है ? विचार भी तो धारण किया जाता है ? लेकिन क्या कभी आपने उस विचार की प्रसव वेदना को सहन किया है ? हर विचार जिसे हम ग्रहण करते हैं, उसका चर्वण किया है: उसके विश्लेषण, संष्लेषण के पार जा कर उसे जन्म दिया है ? जब कोई विचार मन के पार जा कर धारण किया जाता है तो वह अस्तित्व का प्रकटीकरण होता है , अस्तित्व जन्म लेता है, तुमसे । किसी भी विचार को अंधे-धुन आचारण में लाना धर्म नहीं है । अंधा अंधे ठेलिए.. दोवें कूप पड़ंत ।यदि भारतीय जीवन के आश्रम और पुरुषार्थ का अर्थ सही अर्थों में जानना चाहते हैं तो ओशो को पढ़िए, उन्होंने अनेकों बार इनका अर्थ किया है । उनका गीता-दर्शन पढ़िए ।
अंत में कहना चाहूँगा कि ओशो ने कभी काम की निंदा नहीं की, काम को द्वार कहा है समाधि का । लेकिन द्वार को ही समाधि समझने की भूल मत कीजिए । अंदर मंदिर में प्रवेश कीजिए ताकि समाधि घटित हो सके । और यह मत भूलिए कि जहाँ आप हैं, वहीं से यात्रा की शुरुआत हो सकती है ।यदि आप नागपुर में हैं और आप दिल्ली जाना चाहते हैं, तो नागपुर तो छूट ही जाएगा । यदि आप संबोधि पाना चाहते हैं, तो काम तो छूट ही जाएगा ।
ओशो अर्थात सदगुरू।
स्वयं को समझने हेतु ही तो सदगुरू की आवश्यकता होती हैं, यदि आप स्वयं को समझ गए तो बाद में ओशो की क्या आवश्यकता। ये तो ज्ञान प्राप्त हो जाने के पश्चात विद्यालय जाने जैसी बात कर रहे हो।
ओशो से भिन्न दृष्टिकोण रखने वाले महर्षि दयानंद जिन्होने दो लड़ते हुए सांडो को अपनी शक्ति से अलग कर दिया था और अपनी इस शक्ति का श्रेय उन्होने ब्रह्मचर्य को ही दिया था। स्वामी विवेकानंद जी की ओजस्वी वाणी और उनके दिव्य तेज का रहस्य-ब्रह्मचर्य। स्वामी शिवानंद जी, स्वामी योगानंद जी जिनके आगे पाश्चात्य जगत नतमस्तक हुआ, ये सभी महामानव ओशो से भिन्न चिन्तन रखते थे।
मैंने अपनी पिछली चर्चा शुरु करते हुए लिखा था कि स्वयं को समझे बिना ओशो को नहीं समझा जा सकता । फिर आपने एक बार मेरे दृष्टिकोण से ओशो को समझने का उत्तर दिया था । अब आप स्वयं से दूर जा कर फिर से अन्य महापुरुषों को बीच में ला रहें हैं ? महापुरुष स्वयं को समझने में बाधा इसी प्रकार बनते हैं । निश्चित ही महर्षि दयानंद, स्वामी विवेकानंद, स्वामी शिवानंद, स्वामी योगानंद और इस सूची में आप जितने नाम और जोड़ना चाहें वे जोड़ सकते हैं, इनका चिंतन ओशो से अलग ही होगा, क्योंकि ये ओशो नहीं थे । ओशो व्यक्ति को सम्मान देते हैं । व्यक्ति का ही अस्तित्व वास्तव में है। समाज का अस्तित्व व्यक्ति के बिना नहीं हो सकता । यदि व्यक्ति स्वयं को नहीं समझता तो निश्चित ही इस प्रकार के व्यक्तियों से बने समाज का चेहरा वास्तविक नहीं होगा । समाज झूठे चेहरों का पोषण है । ओशो का संबंध व्यक्ति के अस्तित्व से है, समाज उनकी दृष्टि में बहुत झूठा शब्द है । यदि व्यक्ति बदलता है और सत्य का स्वीकार करता है और अपने होने का सही मतलब जानता है, तभी ओशो की दृष्टि में वास्तविक समाज का जन्म होगा । आप स्वयं को देखिए,समझिए न कि अन्य महा पुरुष क्या थे इसे देखिए । ओशो का दर्शन सत्य,स्वयं की खोज और अस्तित्व के परम स्वीकार भाव में निहित है । यदि आप सजगता से स्वयं का निरीक्षण करें तो आप को सब चीजों का जवाब मिल जाएगा । ओशो की दृष्टि में व्यक्ति दुखी इस लिए है क्योंकि वह बाहर सब तरफ़ देखता है, लेकिन स्वयं अपने अंदर नहीं देखता । बाहर समस्याएँ हैं, अंदर परम समाधान है । मैं फिर अनुरोध करुंगा कि यदि आपने स्वयं को जान लिया तो आप ओशो का सही मन्तव्य क्या है, जरूर जान पाएंगे । लेकिन आप अन्य महापुरुषों को दोहराते रहे तो स्वयं को कभी नहीं जान पाएंगे ।
अनुकरण जन्मजात मानवीय-प्रकृति है। मानव अनुकरण से कभी मुक्त नहीं हो सकता। अब अनुकरण किसका करना चाहिएॽ महाजनो येन गतः स पन्थाः । ( महापुरुष जिस मार्ग से गये है, वही (उत्तम) मार्ग है )
मर्यादापुरूषोत्तम भगवान श्रीराम भारतीय संस्कृ्ति की चरम सीमा के प्रतीक हैं। जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है, जिसमें वे आदर्श न हों। श्रीराम शक्ति, शील, एवं समता-स्थितप्रज्ञता(सुख-दुख में समरसता) के अद्भुतसमन्व य हैं। राज्य पद प्राप्ति के सुखद समाचार से उनको प्रसन्न ता नहीं है, वनवास की दुखद बात से कोई मलिनता नहीं है। ऐसा उदात्तं चरित्र जगत में अद्वितीय है। वेद, उपनिषद एवं धर्मशास्त्रों में धर्म का स्वउरूप विस्ताररपूर्वक विवेचित है, किंतु उसका व्यावहारिक स्वरूप देखना हो तो श्रीराम में देखें। श्रीराम ने धर्म को व्यावहारिक रूप दिया है। अत: उनको धर्म का साक्षात् रूप कहा गया है- ‘रामो विग्रहवान् धर्म: ।’ इसलिए श्रीराम को मन-मन्दिर में प्रस्थापित करें। आदर्श आचरण एवं धर्मानुसरण से अपने जीवन को राममय बनायें।
निश्चित ही अनुकरण मानवीय व्यवहार का अनिवार्य अंग है । लेकिन अनुकरण से सीखा गया व्यवहार व्यक्ति का सत्य नहीं होता । यह सामूहिक प्रशिक्षण का एक अंश है । अनुकरण से व्यक्ति को नैतिक तो बनाया जा सकता है, लेकिन धार्मिक नहीं । राम के अनुकरण से कोई भी अन्य राम नहीं बन सकता । ज्यादा से ज्यादा रामलीला का अच्छा अभिनेता बन सकता है । अस्तित्व में कभी किसी व्यक्ति की कार्बन कापियाँ नहीं बनी हैं । हर व्यक्ति अनूठा है, वह राम बनने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं होने के लिए इस जीवन में है ।
जीवन प्रति-क्षण नई नई चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है । किसी भी महापुरुष के जीवन से हमें उन चुनौतियों का उत्तर नहीं मिल सकता । क्योंकि समस्या नई है और समाधान भी नया ही होगा । महापुरुष हम किसे कहते हैं ? उसी व्यक्ति को न, जिसने समस्याओं का समाधान दिया और उसे जिया । हर महापुरूष ने अपनी अद्वितीयता को जिया है, उसने अपने जीवन को अपने स्वभाव के अनुसार जी कर, भीड़ से अलग स्व को पहचान कर अलग पथ को चुना है, इसी में उनकी महानता है । किसी भी महापुरुष का अनुकरण तुम्हें आडम्बरी बना सकता है, लेकिन ऐसे व्यक्ति में स्वयं की कोई पुलक और आनंद न होगा ।
किसी व्यक्ति के पीछे चलकर आज तक कोई भी महान् नहीं बना है । महान वही व्यक्ति होता है, जो अपने स्व के अनुसार जीता है और संपूर्णता से जीता है । महान पुरुषों में स्वयं के प्रति आस्था होती है और उन्हें अपना जीवन जीते हुए तनिक भी ऐसा अहसास नहीं होता कि वे कोई भी कार्य इस लिए कर रहें हैं, कि वे महान बनें । महान पुरुषों में एक सनकीपन होता है, अपनी अद्वितीयता को जीने के लिए ।
प्रिय आज़ाद जी
आप को अभि ओशो के बारे मे ए बि सि भि नहि पता है, आप के समस्या का भि समाधान दे कर गये है, आप पहेले ओशो को नहि अपने आप को जाने
भारतीय संस्कृति में विवाह संस्कार का अतिमहत्व है। विवाह के कारण ही हमारे देश में आज भी आत्मियता और अपनेपन का भाव शेष है।
अधिक सुख के प्रलोभनवश अपनायी उछंखलता के कारण पश्चिम में कितनी आत्महत्याएं हो रही हैं, अपने देश में परिवार से मिली सहानुभूति से हम भारतीय भारी से भारी कष्टों को सहन कर लेते हैं। मैं फिर कहूंगा कि ओशो-चिन्तन कल्याणकारी नहीं है। हां बौद्धिक-व्यायाम (INTELLECTUAL-EXERCISE)दिमागी-कसरत के लिए ओशो-साहित्य अच्छा हैं।
मैं पहले कह चुका हूँ कि विवाह व्यक्ति को परिवार में बाँधे रखने की एक संस्था है और इसके नियम-कानून समय सापेक्ष रहें हैं । क्या आज का विवाह और राम के समय का विवाह एक ही है ? विवाह का रूप हर समय में अलग-अलग रहा । इसके नियम कानून हर समाज-संस्कृति के अनुरूप बदलते रहे । भारत में भी विवाह के अनेक रूप प्रचलित रहें हैं ।
आज हम उत्तर-आधुनिक युग में जीवन जी रहें हैं । इस युग में विवाह की प्रासंगिगता पर लम्बी चर्चा हो सकती है ? लेकिन मैं अपनी बात को ओशो-दर्शन के संदर्भ में रखना चाहूँगा । मैं स्पष्ट करना चाहूँगा कि ओशो ने व्यक्ति को समृद्ध देखना चाहा है, न केवल भौतिक स्तर पर बल्कि आत्मिक स्तर पर भी । उन्होंने इस नए आदमी को नाम दिया है जोरबा दि बुद्धा । यानी ऐसा व्यक्ति जो भौतिक रूप से समृद्ध हो और आध्यात्मिक रूप से भी । भारतीय समाज आज भौतिक रूप से गरीब है, क्योंकि उसने कभी आध्यात्मिकता (अंतर का विज्ञान) को ही सब कुछ मान लिया था । निश्चित ही तब भारत भौतिक रूप से भी समृद्ध रहा था । तभी तो तब इसे सोने की चिड़िया कहा गया । लेकिन भारतीय लोगों ने इस अंदर के विज्ञान को बाहर के विज्ञान आने से पहले ही पा लिया था , जिस वजह से भौतिक रूप से भारतीय निरंतर पीछे छूटते गए और गरीब होते गए । जबकि पश्चिम ने अपना सारा ध्यान बाहर के जगत पर ही केंद्रीत किया, इसलिए वहां बाहर का विज्ञान, जिसे हम साइंस और तकनीक कहते हैं, का इतना विकास संभव हुआ । लेकिन दोनों दृष्टियाँ आधी थी । पूर्णता के लिए धर्म और विज्ञान ,अंदर और बाहर दोनों ओर की यात्रा जरूरी है । जो ओशो में आकर पूरी होती है । 20वीं शताब्दी के महानतम वैज्ञानिक ने विज्ञान के चरम का सपर्श किया और अपने अंतिम दिनों में आध्यात्मिक हो गया । आज पश्चिम समृद्ध है । इसलिए निश्चित ही उसकी धर्म की ओर यात्रा होने की संभावना बढ़ गयी है । गरीब आदमी पहले अपने पेट की चिंता करेगा या अपने होने के रहस्य में डूबना चाहेगा ?
व्यक्ति की शारीरिक जरूरते पूरा होने के बाद ही उसकी मानसिक जरूरते शुरु हो सकती हैं ... भूखे भजन न होए गोपाला ? और जब व्यक्ति की मानसिक जरुरतें पूरी होती हैं, तभी उसकी आत्मिक जरूरते शुरु होती हैं । यह एक विकास क्रम है । इसी लिए भारतीय संस्कृति में जन्म-मरण का चक्र स्वीकार किया गया है । जब तक व्यक्ति स्वयं का साक्षात्कार नहीं कर लेता तब तक वह जन्म लेता रहेगा । लेकिन जो व्यक्ति स्वयं को जान लेता है, वह बाहर के सब सहारे छोड़ देता है । उसे किसी सहारे की जरूरत नहीं होती । क्योंकि वह शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक चीजों से परे का अनुभव रखता है । व्यक्ति बाहर सहारे तभी तक ढ़ँढ़ता है, जब तक कि वह स्वयं को नहीं जानता ।
पश्चिम में आपने आत्म-हत्याओं की बात की । आत्म-हत्या आज पूर्व और पश्चिम की समस्या नहीं रही । आत्म-हत्याएँ भारत में भी उसी अनुपात में हो रही हैं, जिस अनुपात में की किसी अन्य विकसित देश में । इनके कारणों में हम अभी नहीं जाना चाहेंगे। भारतीय परिवार के सच का अध्ययन नये सिरे से करने की जरूरत है । भारतीय लोग आज भी समस्या को सामने लाने के बजाय उसे दबा देने में ही हित समझते हैं ? बेशक उसके परिणाम कुछ भी हों । भारतीय समाज में भी मनोवैज्ञानिकों का कारोबार निरंतर बढ़ रहा है और विवाह के समानांतर लिव-इन-रिलेशन महानगरों में पिछले १० वर्षों में बहुत तेजी से बढ़ रहें हैं ।
आप अभी भी ओशो को सेक्स-गुरु के रूप में देख रहें हैं । आपने तो उनकी पुस्तक का नाम भी सही ढ़ंग से उद्धृत नहीं किया । उनकी पुस्तक का नाम है संभोग से समाधि की ओर ... जबकि आपने उसका नाम लिखा है संभोग से संमाधि, दोनों में बहुत फर्क है । आपने संभोग को ही सब कुछ समझ लिया है, जबकि ओशो का पूरा जोर समाधि पर है । ओशो को जिसने सही ढ़ंग से समझा है, वह उच्छृंखल नहीं, बल्कि स्वयं के आनंद में जीने वाला व्यक्ति होता है। उच्छृंखलता तो उसे छूती तक नहीं । लेकिन उसकी लीला कुछ अलग होती है । कृष्ण की लीला जैसी । जिन्हें आप आज गर्व से पूजते हैं । ओशो न तो स्वयं को सिद्ध करना चाहते हैं और न ही वे किसी के कल्याण की बात करते हैं । उनके लिए तो स्वयं का साक्षात्कार और सत्य ही परम लक्ष्य है, जिसे पाने के लिए उन्होंने अनेक ध्यान पद्धतियाँ विकसित की हैं । आप दूसरों के लिए तभी कल्याणकारी सिद्ध हो सकते हैं, जबकि आपका स्वार्थ सिद्ध हो गया हो । क्या आपनें स्वयं को जानकर स्वार्थ को समझ लिया है ? ओशो ने स्वार्थ को इसी रूप में परिभाषित किया है: जिसने स्वयं का अर्थ सिद्ध कर लिया हो ।
फिर आप ओशो को मात्र बौद्धिक व्यायाम समझते हैं । मित्र ओशो को बुद्धि से नहीं आत्मीयता और अपनेपन से ही समझा जा सकता है । आपको स्पष्ट हो गया होगा कि मेरा आत्मीयता और अपने पन से क्या मतलब है ? अपने सभी मुखौटों को हटा कर सच का सामना करने की हिम्मत जुटाओ ।
विवाह व्यक्ति के भौतिक एवं अध्या्त्मिक विकास में बाधक नहीं, अपितु साधक है। ये तो दो पंखो का परस्पर सहयोग है, अध्यांत्मिक उड़ान भरने हेतु। हां, जो नित नयी दुल्हन चाहते हैं, उनके लिए रूकावट अवश्य है। जो पत्नि को एक डिश मात्र मानते हैं, और एक ही डिश से उबने पर नवीन डिश की चाहत रखते हैं। ऐसे लोगो के लिए तो विवाह बधंन ही है। विवाह वासना को नियंत्रित करने का संस्कार है। चूंकि कोई भी व्यहक्ति हमारी सारी अपेक्षाएं पूर्ण नहीं कर सकता तब मन कहेगा कि जो हमारे स्वाथों पर खरा नहीं उतरा उसे छोड़ और दूसरे को पकड़। ऐसे में विवाह ही हमें अनुशासन में रख सकता है। दूसरे वे व्यक्ति विवाह के खिलाफ हैं जो परिवारिक जिम्में वारियों को निभाने में अयोग्य हैं। खैर तुम्हारे सुधार के लिए तो भाभी से ही सहायता लेनी पड़ेगी। वे ही तुम्हें अपने वज्र (बेल्लैन) से सुधार सकती हैं। ‘भाभी’ समय रहते ही अपने मनोज का सुधार कर लो नहीं तो ये तुम्हारे(होने वाले या हो चुके) बच्चों की गृहस्थी नहीं बसाएगा। फिर तुम नानी, दादी कैसे बनोगीॽ और बाललीला का आनंद लेने से भी वंचित रहोगी। सोच लीजिए। ‘मनोज भाई’ इन पंक्तियों पर भाभी(होने वाली या हो चुकी) का दृष्टिपात अवश्यं करवाना। और मेरे दूसरे भाई बहन भी कृपया इस परिचर्चा में इंटरेस्ट लें- इंटरफेयर करें। भारतीय संस्कृति के फेवर में कोई तो बोलो। जय श्री राम!
आप मेरे आशय को समझे नहीं । व्यक्ति स्वतंत्र है, लेकिन विश्वसत्ता से अभिन्न रूप से जुड़ा है । इस दृष्टि से हम परस्पर एक दूसरे पर आश्रित हैं । लेकिन जब व्यक्ति का अहम प्रगाढ़ हो जाता है और वह स्वयं को विश्वसत्ता से भिन्न समझता है, तो वह विकलता और तनाव से ग्रसित हो जाता है । लेकिन जब वह अपने इस अहम के विज्ञान को समझ लेता है, तो विश्वसत्ता से जुड़ जाता है और परमात्मा के सान्निध्य में आ जाता है । परमात्मा के सान्निध्य में आ जाना ही विश्राम है । तब विकलता और चिंता का नाश हो जाता है । आप जिन संस्कारों में जी रहें हैं, उसी को अपना संसार समझ रहें हैं । आपने कूँएं के मेंडक वाली कहानी तो सुनी ही होगी । कूँए के मेंडक को यह समझाना कि सागर क्या है, अति कठिन है । विवाह एक संस्कार है । लेकिन दो व्यक्तियों के जुड़ने के लिए विवाह जरूरी नहीं है । प्रेम की परिपूर्णता में व्यक्ति विश्वसत्ता से संबंधित होता है । प्रेम की अग्नि में ही स्व और पर के भेद भस्म हो जाते हैं और उसकी अनुभूति उपलब्ध होती है, जो कि स्व और पर के पार है । धर्म की भाषा में इस सत्य की अनुभूति ही परमात्मा है । दो व्यक्तियों को संबंधित होने के लिए किसी धर्म, जाति, रंग-रूप और देश से कुछ लेना नहीं । लेकिन विवाह को इस से लेना है ? क्या आप ऐसे परिवार की कल्पना कर सकते हैं, जिसमें परिवार का एक सदस्य हिंदु हो, दुसरा मुस्लिम, तीसरा इसाई । लेकिन ओशो ने ऐसे परिवारों की पैरवी की है । धर्म व्यक्ति का निजी मामला है । एक ही परिवार में किसी को मोहम्मद के चरित्र से धर्म की जिज्ञासा जाग सकती है, तो किसी को कृष्ण के चरित्र से और किसी को ईसा के चरित्र से । इसमें परिवार के अन्य सदस्यों को क्यों आपत्ति हो ? लेकिन विवाह को बचाना है और भारतीय संस्कृति को बचाना है, तो हिंदु संस्कृति के अनुसार जीना होगा । यह सहिष्णुता नहीं, कट्टरता है । और आज जिस युग में हम जी रहें हैं, वह वैश्वीकरण का युग है, इस युग में संपूर्ण विश्व एक गाँव है । आज अहंकारों की रक्षा करना सबसे बड़ी समस्या (आप जैसे अहम ग्रसित लोगों के लिए)है । तकनीक और विज्ञान ने हमें धार्मिक होने में बहुत मदद की है । हमारे सब संकीर्ण स्वार्थों को विज्ञान ने मिटा दिया है । इसी लिए मैंने अपनी पूर्व चर्चा में कहा कि विज्ञान से पहले आया धर्म अंधविश्वास पकड़ लेगा । लेकिन विज्ञान के बाद आए धर्म में अंधविश्वास का कोई स्थान नहीं है। विज्ञान ने एक विश्वसत्ता और परम विस्तार को स्वीकार किया है । तभी तो आइस्टीन भी कहता है कि धर्म रहित विज्ञान लंगड़ा है और विज्ञान रहित धर्म अंधा है ।
फिर तुम इच्छाओं को पाले हुए हो । जब तक इच्छा है, तब तक धर्म में प्रवेश कैसे होगा ? इच्छा से तो तुम्हारा अहम जीवित है । अभी तो तुम बहुत महत्वाकांक्षी हो । अभी तो तुम्हें अपने अहंकार की पुष्टि के लिए, भारतीय संस्कृति के नाम पर बहुत लोगों के बीच लड़ाई लड़वानी है और स्वयं को धर्म का रक्षक घोषित कर चतुर राजनीतीज्ञ बन लोगों की भीड़ इकट्ठा करनी है, ताकि दिल्ली पहुँच सको और भारत के प्रधानमंत्री बन सको । मनुष्य कब तक अपने अहंकार को इस तरह पोषित करता रहेगा ।
मेरा परिवार कैसा है ? इसकी चिंता करने की तुम्हें जरूरत नहीं । क्योंकि जो सागर का अनुभव जानता है, वह कूप मंडूक नहीं बनता ।
धार्मिक होने के लिए स्वयं के समक्ष नग्न खड़ा होने की हिम्मत चाहिए, दूसरों को लड़ा कर राजनीतिज्ञ बना जा सकता है धार्मिक नहीं ।
ओशो को हम क्या कहें धर्मगुरु, संत, अचार्य, अवतारी, भगवान, मसीहा, प्रवचनकार, धर्मविरोधी या फिर सेक्स गुरु। जो ओशो को नहीं जानते हैं और या जो ओशो को थोड़ा बहुत ही जानते हैं उनके लिए ओशो उपरोक्त में से कुछ भी हो सकते हैं।
लेकिन, जो पूरी तरह से जानते हैं, वे जानते हैं कि ओशो हैं 'न्यू मेन' अर्थात एक ऐसा आदमी जिसके लिए स्वर्ग, नरक, आत्मा, परमात्मा, समाज, राष्ट्र और वह सभी अव्याकृत प्रश्न तीसरे दर्जे के हैं, जिसके पीछे दुनिया में पागलपन की हद हो चली है।
नीत्से ने जिस न्यू मेन की कल्पना की थी वह नहीं और महर्षि अरविंद ने जिस अतिमानव की कल्पना की थी वह भी नहीं। ओशो बुद्धि और भाव के परे उस जगत की बात करते हैं जहाँ का मानव ईश्वर को छूने की ताकत रखता है। निश्चत ही ओशो ईश्वर होने की बात नहीं करते लेकिन कहते हैं कि मानव में वह ताकत है कि वह एक ऐसा मानव बन जाए जो इस धरती की सारी बचकानी बातों से निजात पा स्वयं को स्वयं में स्थित कर हो ले, वह जो होना चाहे। ईश्वर ने मानव को वह ताकत दी है कि वह उसके समान हो जाए।
ओशो कहते हैं कि दुनिया अनुयायियों की वजह से बेहाल है इसलिए तुम मेरी बातों से प्रभावित होकर मेरा अनुयायी मत बनना अन्यथा एक नए तरीके की बेवकूफी शुरू हो जाएगी। मैं जो कह रहा हूँ उसका अनुसरण मत करने लग जाना। खुद जानना की सत्य क्या है और जब जान लो की सत्य यह है तो इतना कर सको तो करना कि मेरे गवाह बन जाना। इसके लिए भी कोई आग्रह नहीं है।
यदि आज भी सूली देना प्रचलन में होता तो निश्चित ही ओशो को सूली पर लटका दिया जाता लेकिन अमेरिका ऐसा नहीं कर सकता था इसलिए उसने ओशो को थेलिसियम का एक इंजेक्शन लगाया जिसकी वजह से 19 जनवरी, 1990 में ओशो ने देह छोड़ दी।
निश्चित ही ओशो बुद्ध जैसी ऊँचाइयाँ छूने वाले ईसा मसीह के पश्चात सर्वाधिक विवादास्पद व्यक्ति रहे हैं। 70 के दशक में ओशो और ओशो के संन्यासियों को दुनिया भर में प्रताड़ित किया यह बात सर्वविदित है लेकिन इससे भी ज्यादा दुखदाई बात है कि ओशो प्रेमियों को आज भी इस संदेह से देखा जाता है कि मानो वह कोई अनैतिक या समाज विरोधी हैं खासकर वामपंथी तो उन्हें देखकर बुरी तरह चिढ़ जाते हैं।
खैर! ओशो के निर्वाण दिवस पर इस बात की आशा करना कि ओशो को अब धीरे-धीरे लोग समझने लगे हैं यह बात उतनी ही धूमिल और अस्पष्ट है, जितनी कि मार्क्स को आज भी लोग समझने में लगे हैं। आज किसी से यह कहना कि मैं ओशो प्रेमी हूँ उतना ही खतरनाक है जितना की मार्क्स के शुरुआती दौर में खुद को मार्क्सवादी कहना।
जीवन पर्यन्त ओशो हर तरह के 'वाद' का इसलिए विरोध करते रहे कि आज जिस वाद के पीछे दुनिया पागल है दरअसल वह अब शुद्ध रहा कहाँ। इसलिए ओशो ने जब पहली दफे धर्मग्रंथों पर सदियों से जमी धूल को झाड़ने का काम किया तो तलवारें तन गईं। यह तलवारें आज भी तनी हुई हैं, जबकि दबी जबान से वही तलवारबाज कहते हैं कि कुछ तो बात है ओशो में। लेकिन हम खुलेआम इस बात को आम नहीं कर सकते। आग भड़क जाएगी।
मेरे ताऊ! बात तो रावण में भी कुछ कम नहीं थी। बड़ा गुणनिधान, विद्वान और प्रतिभावान था वह भी परन्तुा लोकआदर्श तो भगवान श्री राम ही हो सकते हैं रावण नहीं। अनुयायी बनना अर्थात अनुकरण करना। ओशो-प्रेमी भी अपनी सन्तान को ओशो की राह पर नहीं चलाना चाहते। और वे स्वयं भी ओशो के साथ क्यों जुड़े इसलिए कि साधना,संयम तो बस की है नहीं, चलो दिल को तसल्ली् हो गई कि हमारी भी कोई दिशा है या कहें हमारे भी कोई गुरू हैं। ये तो सब जानते हैं कि ये ओशो की बातें यर्थाथ लोकव्यवहार में नहीं उतारी जा सकती। मन को संयम, अनुशासन, साधनादि अच्छेी नहीं लगते गिरावट की बातें इसे खूब भाती हैं। जैसे सीढ़ी से गेंद को नीचे लुड़काने में परिश्रम की आवश्यसकता नहीं होती।
भाई भारतीय तलवार ही तो नहीं चलाते। जिसको किसी देश में शरण नहीं मिली उसे भारत ने शरण दी है। ओशो अगर भक्त होते तो मीराबाई की तरह उनको दिया जहर भी अमृत हो जाता परन्तु उनका ज्ञान उनकी रक्षा नहीं कर सका। तभी उनको अपनी गल्ती का भान हुआ और उन्हों ने अपने नाम के आगे से भगवान संबोधन हटा लिया। थोड़ा समय और रहते तो कदाचित उन्हें अपनी और भी त्रुटियों का आभास होता जैसे कि भगवान श्रीराम की शान में सूर्पनखा प्रसंग के तहत कामेंट करना। सीतामाता पर जब सूर्पनखा आक्रमण करने लगी तो उसे दण्डक देना अनिवार्य हो गया फिर भी दयासागर भगवान खेद प्रगट करने लगे कि आख्रिर एक नारी थी। तब लखन भैया ने कहा कि गुरू विश्वारमित्र ने ताड़का वध की भी तो आज्ञा दी थी। अगर नारी होने के कारण सूर्पनखा को दण्ड देना ओशोनुसार गल्ते था तब तो अपराधी नारियों को सरकार को दण्डे नहीं देना चाहिए हां। खैर, ओशो ने बख्शा ही किसेॽ बापू भी गल्त , मदर टरेसा भी----आप सोच रहे हैं कि ये सब तो आजाद कोरी बाते ही छोड़े जा रहा है। तो अनुभव आपने भी कहां किया हैॽ एक दिन के लिए ही आप ओशोनुसार प्रयोग कीजिए। किसी सुंदरी को देख मन का दमन न करके मनमानी कीजिए। अपने वरिष्ठ अधिकारी पर क्रोध आने पर कोध्र को बिना दबाए साक्षी होकर निरीक्षण करना कि अखिलेश को कोध्र आ रहा है। किसी हलवाई की दुकान से मिठाई उड़ाकर खाना। अर्थात काम-कोध्र-लोभ का एक दिन के लिए ही संयम ना रखने पर ही ऐसी मरम्मत होगी कि तुम्हारी हालत प्रतिक्रिया देने योग्य न रहेगी। फिर जब हालत संभले तो एकदम स्वस्थ और सटीक प्रतिक्रिया दोगे मुझे प्रतिक्षा रहेगी।
जयसच्चिदानंद।
मित्र !!! ऐसा प्रतीत होता है कि आप अपनी धारणाओं को नहीं छोड़ना चाहते । और ऐसे चित्त में सत्य कैसे प्रतिबिम्बित हो सकता है, जो पहले से ही विकारों से आच्छादित है ।
महर्षि रमण से किसी ने पूछा कि सत्य को जानने के लिए मैं क्या सीखूं ? श्री रमण ने कहा जो जानते हो उसे भूल जाओ । यह उत्तर बहुत अर्थपूर्ण है । मनुष्य का मन बाहर से संस्कार और शिक्षाएं लेकर एक कारागृह बन जाता है। बाह्य प्रभावों की धूल में दबकर उसकी स्वयं की दर्पण जैसी निर्मलता ढक जाती है । जैसे किसी झील पर कोई आवृत्त हो जाए और सूर्य या चंद्रमा का प्रतिबिम्ब उसमें न बन सके । ऐसे ही मन भी बाहर के सीखे गए ज्ञान से इतना आवृत्त हो जाता है कि सत्य का प्रतिफलन उसमें नहीं हो पाता । ऐसे मन के द्वार और झरोखे बंद हो जाते हैं । वह अपनी ही क्षुद्रता में सीमित हो जाता है , और विराट के संपर्क से वंचित । इस भांति बंद मन ही बंधन है । सत्य के सागर में जिन्हें संचरण करना है, उन्हें मन को सीखे हुए किसी भी खूंटे से बांधने का कोई उपाय नहीं है । तट से बंधे होना और साथ ही सागर में प्रवेश कैसे संभव है ?
एक पुरानी कथा है - एक संन्यासी सूर्य निकलने के पूर्व ही नदी में स्नान करने उतरा, अभी अंधियारा था और भोर के अंतिम तारे डूबते थे । एक व्यक्ति नाव पर बैठकर पतवार चलाता था, किंतु नाव आगे नहीं बढ़ती थी । अंधरे के कारण उसे वह सांकल नहीं दिखती थी, जिससे नाव बंधी हुई थी । उसने चिल्ला कर संन्यासी से पूछा कि स्वामी जी इस नाव को क्या हो गया है। उस संन्यासी ने कहा, मित्र पहले खूंटे से बंधी उसकी सांकल को तो खोलो । मनुष्य जो भी बाहर से सीख लेता है, वह सीखा हुआ ज्ञान ही खूंटों की भांति उसके चित्त की नाव को अपने से बांध लेता है और आत्मा के सागर में उसका प्रवेश संभव नहीं हो पाता । जिसे परमात्मा के ज्ञान को पाना हो उसे बाहर से सीखे गए अपने ज्ञान को छोड़ देना होगा । इस अवस्था को दिव्य अज्ञान कह सकते हैं । इसे साध लेने से बड़ी और कोई साधना नहीं है ।
कुछ भी जानने का भाव अहंकार को पुष्ट करता है । इसीलिए उपनिषद् के ऋषियों ने कहा है कि जो कहे कि मैं जानता हूँ, तो जानना कि, वह नहीं जानता । जो जानते हैं, उनका तो मैं खो जाता है । बाहर से आया हुआ ज्ञान मैं को भरता है; भीतर से जगा हुआ ज्ञान उसे बहा ले जाता है । ज्ञान को पाने की विधि है कि सब ज्ञान को छोड़ दो । मैं को शून्य होने दो और चित्त को मौन । उस मौन और शून्यता में ही उसके दर्शन होते हैं जो कि सत्य है ।
ज्ञान नहीं विचार सीखे जा सकते हैं । विचारों के संग्रह से ही ज्ञान का भ्रम पैदा हो जाता है । विचार कम हो सकते हैं; विचार ज्यादा भी हो सकते हैं । ज्ञान न तो कम होता है और न ज्यादा होता है । या तो ज्ञान होता है या अज्ञान होता है । यह भी स्मरण रहे कि विचार अज्ञान का अंग है । केवल अज्ञानी ही विचार करता है । ज्ञानी विचारता नहीं देखता है । जिसके आंख है, उसे दिखाई पड़ता है । वह सोचता नहीं कि द्वार कहां है, वह तो द्वार को देखता है। जिसके पास आंख नहीं, वह सोचता है और टटोलता है, विचार टटोलना मात्र है । वह आंख का नहीं अंधे होने का प्रमाण है । बुद्ध, महावीर या ईसा विचारक नहीं हैं । हमने सदा ही उन्हें द्रष्टा कहा है । वे जो भी जानते हैं, वह उनके चिंतन का परिणाम नहीं, उनके दर्शन की प्रतीति है । वे जो भी करते हैं, वह भी विचार का फल नहीं है । उनकी अंतर्दृष्टि की सहज निष्पत्ति है । इस सत्य को समझना बहुत आवश्यक है ।
विचारों का संग्रह कहीं भी नहीं ले जाता । सभी प्रकार के संग्रह दरिद्रता को मिटाते नहीं, दबाते हैं । इसी लिए जो सर्वाधिक दरिद्र होते हैं, संग्रह की इच्छा भी उनकी सर्वाधिक होती है । डायोजनीज ने सिकंदर को कहा था, मैं इतना समृद्ध हूँ कि मैं कुछ भी संग्रह नहीं करता । और तेरी दरिद्रता का अंत नहीं, क्योंकि इस पूरी पृथ्वी के साम्राज्य को पा लेने पर भी तुम संग्रह करोगे । इसी लिए जब सम्राटों को संग्रह में छिपी दरिद्रता के दर्शन हुए हैं, तो उन्होंने दरिद्रता में छिपे साम्राज्य को स्वीकार कर लिया । क्या मनुष्य का इतिहास ऐसे भिखारियों से परिचित नहीं, जिनसे सम्राट बड़े कभी नहीं होते । जो धन संग्रह के संबंध में सत्य है, वह सभी प्रकार के संग्रहों के लिए भी सत्य है । विचार संग्रह भी उसका अपवाद नहीं । बाह्य संपत्ति के संग्रह से जो धनी है; वह यदि दरिद्र है, तो शास्त्रों के शब्दों से जो ज्ञानी है, वह भी अज्ञानी ही है ।शास्त्र से नहीं, जब स्वयं से और जब शब्द से नहीं बल्कि अंतस से आलोक मिलता है, तभी ज्ञान का आविर्भाव होता है ।
ज्ञान का जन्म ध्यान से होता है । ध्यान का अर्थ है : विचार छोड़कर चेतना में प्रतिष्ठित हो जाना । विचारों के प्रवाह का नाम मन है । जो इन विचारों के प्रवाह को देखता है, उसका नाम चेतना है । विचार विषय है और चेतना विषयी । विचार दृश्य है, चेतना द्रष्टा । विचार जाने जाते हैं, चेतना जानती है । विचार बाहर से आते हैं, चेतना भीतर है । विचार पर है, चेतना स्व है । विचारों को छोड़ना है और चेतना में ठहरना है । सब धर्मों की साधना का सार यही है ।
विचार प्रवाह के सम्यक् निरीक्षण से तथा तटस्थ साक्षी भाव से मात्र उन्हें देखने से वे धीरे-धीरे क्षीण हो जाते हैं । जैसे कोई बिल्ली चूहे को पकड़ती हो तो पकड़ने के पूर्व उसकी तैयारी पर ध्यान दें । कितनी सजग और कितनी शांत, कितनी शिथिल और तैयार ! ऐसे ही स्वयं के भीतर विचार को पकड़ने के लिए होना पड़ता है । जैसे ही कोई विचार उठे, बिल्ली की भांति झपटें और उसे पकड़ लें । उसे उलटें-पलटें और उसका निरीक्षण करें । किंतु उसे सोचे नहीं, मात्र देंखें । और तब पाया जाता है कि वह देखते ही देखते वाष्पीभूत हो गया है। हाथ खाली और विचार विलीन हो जाता है । फिर शांत और सजग रहें । दूसरा विचार आएगा, उसके साथ भी यही करना । तीसरा आएगा, उसके साथ भी यही । इस प्रकार ध्यान का अभ्यास करना । जैसे-जैसे अभ्यास गहरा होता है, वैसे-वैसे बिल्ली बैठी रह जाती है और चूहे विलीन हो जाते हैं । चूहे जैसे बिल्ली से डरते हैं, विचार वैसे ही ध्यान से डरते हैं । बिल्ली जैसे चूहों की मृत्यु है, ध्यान वैसे ही विचारों की मृत्यु है ।
विचार की मृत्यु पर सत्य का दर्शन होता है । तब मात्र वही शेष रह जाता है- जो है । वह सत्य है । वही परमात्मा है । उसे जानने में ही मुक्ति है और दुख व अंधकार का अतिक्रमण है ।
मनोज भारती आजाद ओर अखिलेश ने ओशो पर अपने सार्थक विचार लिखे है
बात ओशो के विचारो का अनुकरण करने की नही है
आध्यात्म ओर विग्यान के बीच सन्तुलन स्थापित करते हुए अपने जीवन को
ईमानदारी से जीने की है !
ये सारी कवायद उसी के लिये ही तो हो रही है!
यह मुद्दा कई बार उथा है !
अपनी विवेक बुधि का प्रयोग करे ओर भारतीयता की गरिमा को सुरक्शित
रखते हुए अपना जीवन ईमानदारी से जिये तो इस बहस की सार्थकता सिध् हो सकेगी !
मनुष्य के व्यक्तित्व में सबसे बड़ा अंतर्द्वन्द्व इस मान्यता से पैदा होता है कि उसका शरीर और उसकी आत्मा विरोधी सत्य हैं । यह स्वीकृति आधारभूत रूप से मनुष्य को विभाजित कर देती है । फिर स्वभावत: इन दोनों विभाजित खेमों में संघर्ष और कलह प्रारंभ हो जाता है । यह फिर न केवल मनुष्य के व्यक्तित्व में बल्कि समाज के व्यक्तित्व में भी प्रतिफलित होता है । इसी के आधार पर अब तक की सारी संस्कृतियां खंड संस्कृतियां हैं । अखंड और समग्र जीवन को समाविष्ट करने वाली संस्कृति का अभी जन्म नहीं हुआ है । जब तक शरीर और आत्मा, पदार्थ और परमात्मा, संसार और मोक्ष के बीच विरोध की जगह सामंजस्य और समस्वरता स्थापित नहीं होती, तब तक यह हो भी नहीं सकता । अब तक या तो ऐसी विचार-दृष्टियाँ रही हैं, जो आत्मा के निषेध पर शरीर -मात्र को ही स्वीकार करती हैं या फिर ऐसी परम्पराएं रही हैं जो शरीर के निषेध पर मात्र आत्मा की सत्ता को स्वीकार करती हैं । एक विचार वर्ग परमात्मा को असत्य मानता है और दूसरा संसार को माया और भ्रम । ये दोनों विचारधाराएँ ही पूर्ण मनुष्य को स्वीकार करने में भय खाती हैं । वे उसी अंश को स्वीकार करते हैं, जिसे पहले से ही स्वीकार करने की उन्होंने धारणा बना रखी है । जैसे कोई वस्त्र पहले बना ले और फिर मनुष्य को काट-छांट कर वस्त्र पहनाने की चेष्टा करे । ऐसी ही चेष्टा उनकी है । धारणाएं पहले तय कर ली जाती हैं, और फिर बाद में उन्हें मनुष्य को पहना दिया जाता है । जबकि विवेकपूर्ण यही होगा कि हम पहले मनुष्य को उसकी समग्रता में विचार करें और फिर कोई जीवन-दर्शन बनाएं । विचार संख्या या विचारधाराएं महत्वपूर्ण नहीं - महत्वपूर्ण मनुष्य की यथार्थता है । धार्मिक और भौतिकवादी दोनों ही पूर्व पक्षों को छोड़ कर यदि मनुष्य को देखा जाए, तो न तो वह मात्र शरीर ही है और न मात्र आत्मा ही । वह तो अद्वय इकाई है । शरीर और आत्मा हमारे विचार के विभाजन हैं । मनुष्य तो अखंड है । वस्तुत: शरीर और आत्मा का जहां मिलन है, वहीं मनुष्य की उत्पत्ति है । वे आत्माएं जो किसी अशरीरी मोक्ष में हैं, उन्हें हम मनुष्य नहीं कह सकते और न ही उन शरीरों को को जो आत्म रहित हैं । मनुष्य आत्मा और शरीर का संगम है । इसलिए उसके संबंध में किसी भी पक्ष को दूसरे के निषेध पर स्वीकार कर लेना घातक ही सिद्ध होता है और ऐसी स्वीकृति से बनी हुई संस्कृति अधूरी, पंगु एवं एकांगी है । या तो सामान्य दैहिक वासनाओं का जीवन ही उसके लिए सब कुछ हो जाता है या फिर काम ही उसके लिए केंद्र हो जाता है । फिर उसके लिए और किसी चीज़ की सत्ता नहीं होती । स्वभावत: ऐसी दृष्टि शांति, सत्य और ऊर्ध्वगमन की सब संभावनाएं छीन लेती है । मनुष्य एक डबरे में बंद हो जाता है और सागर तक पहुँचने की गति, आकर्षण और अभीप्सा सभी खो जाते हैं । दूसरी ओर जो पदार्थ को अस्वीकार कर देते हैं, वे भी शक्तिहीन हो जाते हैं और भूमि से उनकी जड़ें टूट जाती हैं । उनका होना न होने की भांति हो जाता है । इस तरह से दोनों विकल्प अनुभव किए गए हैं, और उनकी दोषपूर्ण स्थिति भी प्रत्यक्ष हो गई है ।
जिन संस्कृतियों ने जड़ को सब कुछ माना उनके पास संपदा आई, शक्ति आई लेकिन साथ ही अशांति और विनाश भी । और जिन्होंने जड़ को कुछ भी न माना वे संपदाशून्य, शक्तिरिक्त, दास और दरिद्र होते देखे गए । समय आ गया है कि इस भूल के प्रति हम सचेत हों और जड़तावादी या ब्रह्मवादी की अतियों से बचें । अति सदा वर्जित है और अनिवार्य रूप से अति का अनुगमन असत्य में होता है । सत्य सदा मध्य में है, क्योंकि सत्य सदा संतुलन और संगति में है ।
शरीर और आत्मा में किसी एक को नहीं चुनना है । पदार्थ और परमात्मा में से किसी एक पक्ष में खड़ा नहीं होना है । क्योंकि जो जानते हैं, वे विश्व सत्ता में दो का अनुभव ही नहीं करते । जो जड़ की भांति प्रतीत हो रहा है, वह भी मूलत: और अंतत: वही है जो चैतन्य की तरह अनुभव में आता है । विश्वसत्ता एक ही है । उसकी अभिव्यक्तियां ही अलग हैं। जो दृश्य परमात्मा है, वही संसार है और जो अदृश्य संसार है वही परमात्मा है । यदि हम जड़ सत्ता का आत्यंतिक अनुसंधान करें, तो वह अदृश्य में विलीन हो जाता है । विज्ञान ने यह किया और परमाणु के विभाजन के बाद वह जिन सत्ता-कणों पर पहुँचा है, वे पदार्थ नहीं हैं, न ही वे दृश्य हैं, बल्कि अदृश्य ऊर्जा मात्र में परिणत हो गए । ऐसे ही जिन्होंने चेतना का आत्यंतिक अनुसंधान किया है, उन्होंने पाया है कि चेतना ही दृश्य हो जाती है अर्थात् अदृश्य आत्मशक्ति का भी साक्षात्कार हो जाता है । और यह साक्षात्कार इतना प्रगाढ़ होता है, कि उसके समक्ष पदार्थ ही असत्तावान मालूम होने लगता है । इस सत्य को ध्यान में रखें तो ज्ञात होगा कि जो दृश्य है, वह अदृश्य ही है और जो अदृश्य है वह भी दृश्य है । संसार और मोक्ष भिन्न नहीं हैं , अभिन्न हैं । अज्ञान में जो संसार मालूम होता है, ज्ञान में वही मोक्ष हो जाता है । अंधरे में जो पदार्थ मालूम होता है, आलोक में वही परमात्मा में परिणत हो जाता है । दोनों के बीच एकता है । और इस एकता का अनुभव केवल वही कर पाते हैं, जो दोनों के बीच अतिवादी द्वंद्व से नहीं बल्कि दोनों के मध्य संतुलन से प्रारंभ करते हैं ।
हमने अतियों में जीकर देख लिया है । वह प्रयोग किसी भी दिशा में सफल नहीं हुआ है । अब अन-अति का प्रयोग करने का समय है । मनुष्य को उसकी पूर्णता को स्वीकार कर संस्कृति का निर्माण करना है ।
आयुर्वेद के अनुसार हमारे शरीर में वात, पित, कफ का संतुलन हो तो हम स्वस्थ रह सकते हैं। एक कुशल वैद्य रोगी का परीक्षण करता है कि इसका शरीर वातप्रधान- पितप्रधान अथवा कफप्रधान किस प्रकृति का है? तदानुसार उसे पथ्य बताता है। अब पितप्रधान प्रकृति के व्यक्ति को ठण्डी चीजें लाभदायक होती हैं। परन्तु अगर उसके भाई का शरीर वातप्रधान-प्रकृति का हो और वह ये समझे कि उसके लिए भी ठण्डी चीजें लाभदायक हैं तो यह तो गलत है ना। अब वह चाहता तो अपने बन्धु का कल्याण ही है परन्तु एक एक कुशल वैद्य जानता है कि इस तरह उनका हित सम्भव नहीं। इसी तरह मस्तिष्कप्रधान व्यक्ति के लिए ज्ञान,विज्ञान और हृदयप्रधान व्याक्ति के लिए भक्ति अनुकुल साधन है। लगता है कि क्रमश: मनोज, अखिलेश और आजाद तीनों भिन्न् प्रकृति के होते हुए अपने विचारानुसार ईकदूजे का कल्याण चाहते हैं और करिया बहन तीनो में समन्वय कराने का प्रयास कर रही है। बड़ा आनंद- आनंद- आनंद
करिया दीदी ने भारतीय-गरिमा को सुरक्षित रखने की जो बात कही इसकी आशा 'ओशो-प्रेमियों' से नहीं रखनी चाहिए। 'ओशो' भारतीय- संस्कृति को रूग्ण और इसके मूलाधार संस्कारों को अवैज्ञानिक बताते थे।
इस तरह तो हम ओशो की विधी 'मै कौन हूं' को भी अवैज्ञानिक कह सकते हैं। इस पद्धति में अपने आप से पुर्नपुन: ये प्रश्न दोहराना होता है। 'मै कौन हूं' 'मै कौन हूं' दोहराते रहिए। अब वैज्ञानिक सोच इसे कहां स्वीकार कर सकती है कि उत्तर मिलेगा। परन्तु भारतीय-संस्कृति हमें किसी के मत का अनादर करना नहीं सिखाती हो सकता है कि उनका अनुभव समाचिन रहा हो। भारतीय-संस्कृति की उदारता देखिए- हिंदु धर्म ने तो अवैदिक बौद्धधर्म के प्रवर्तक भगवान बुद्ध को भी अपने 24 अवतारों में स्वीकार किया है।
मानव पढ़ना-लिखना-बोलना सब अनुकरण से ही सीखता है। भारतीय संस्कृति हमें उच्च आर्दशमय जीवन प्रदान करती है। भगवान श्री राम के उपदेशों पर चलना ही उनका अनुकरण करना है उनकी तरह धनुषादि धारण करके दूसरा श्रीराम बनना नहीं। और हजारों महामानवों ने उनके उपदेशानुसार अपना जीवन सार्थक किया भी है।
कुछ समय श्रीराम-श्रीराम का जाप कीजिए,
फिर ओशो-ओशो का जाप करके देखिए।
अथवा रामायण का पाठ कीजिए,
फिर ओशो-साहित्य का अध्ययन करके देखिए।
एक का परिणाम अपूर्व-शान्ति और दूसरी तरफ अपार तनाव।
भगवान श्री राम के उपदेशानुसार संयम मर्यादा सहित जी कर देखें या
एक दिन के लिए आप ओशो के उपदेशानुसार प्रयोग कीजिए। मन का दमन न करके मनमानी कीजिए। इस प्रकार मन-वचन-कर्म तीनों प्रकार से परीक्षण करके देख लीजिए। अगर आप परलोकादि में विश्वास न भी करते हों तब भी भगवान श्री राम के उपदेशानुसार जीवन जीने से आपको समाज में यश कीर्ति स्वास्थ्यादि का प्रत्यक्ष लाभ तो मिलेगा ही।
स्वयम को जानने के लिये जाप ही करना है तो " मै शुध्द बुध्द चेतन्य आत्मा हू " इसका जाप कीजिये , करके तो देखिये, आप स्वयम को एसा ही पायेगे !
जीवन को प्रयोगशाला बनाना ही है तो जो परीक्शण करे उनमे सफल होने के लिये मनोविग्यान का सहारा लेना ही होगा !
इससे भारतीय या पश्चात्य सस्क्रिति के बीच का भेद भी समाप्त हो जायेगा और वेग्यानिक आधार भी प्राप्त हो जायेगा !
हमारी सोच जेसी होती है वैसे ही हमारे शरीर के हार्मोन्स मै बदलाव आता है !
ओशो या राम की तरह नही आप अपनी जिदगी अपनी तरह भी जी सकेगे और खुद से ईमानदार भी रह सकेगे !
मित्रो , अनुनाईयो के मध्य बहस अंतहीन होती है क्योकि कोइ भी अपनी सीमाओ से परे जाकर अपने अनुनाई भाव से मुक्त होते हुए सत्यान्वेषण करने की क्षमता नही जुटा पाता। अनुनाई सदैव विवाद से लेकर युद्ध महायुद्ध तक सदियो से करते आ रहे है।
परन्तु साधको के मध्य बहस जब भी होती है तो नई दिशाए खुलने लगती है बात सत्यान्वेषण के प्रति जिग्यासा की है जो साधको मे भरपूर होती है जबकि अनुनाई ग्रहण किए गए विचारो, तथा पूर्व निर्धारित मार्ग के अनुकरण भाव से ही मुक्त नही हो पाते अतः वे प्राप्त ग्यान की पुनरावृत्ति के लिए योग्य होते है पर सत्यान्वेषण के लिए नई खोजो के लिए तो वेग्यानिको साधको को ही अपनी भूमिका निभानी होती है।
आप हृदय से भक्ती और मस्तिष्क से वैज्ञानिक थे। ऐसा नहीं है कि भारतीय मनीषी केवल आस्था:भक्ति तक सीमित हों उन्हें विज्ञानसम्मत ज्ञानधारा बहानी भी आती है। अगर ऐसा न होता तो शिकागो धर्म सभा में जहांकि अनेक धर्मों के विद्वान उपस्थित थे स्वामी विवेकानंद को महान ज्ञानी स्वीकार न करते। मैं अपने लेख-कम्पयूटर श्रेष्ठ या मानवॽ में लिख चुका हूं कि मानव में ह्रदय की श्रेष्ठता सिद्ध है। स्वामी विवेकानंद को ज्ञान के साथ हृदय की सवेंदनाओं का आस्था:भक्ति का आदर करना भी आता था। परंतु ओशो की भाषा आक्रमक होने के साथ अमर्यादित भी है। स्वामी विवेकानंद ने कैसे महामानवों का निर्माण किया यह रामकृष्णन मठ में जाकर अन्वे षण कर सकते हो। और ओशो के चहेते उनकी तरह ही आक्रमक-‘‘अपने को सागर और दूसरों को कूप मंडूक’’ क्या यही है अहंशून्यता? ‘‘मेरा परिवार कैसा है ? इसकी चिंता करने की तुम्हें जरूरत नहीं ।’’ क्या यही है विश्वकुटुम्ब की भावना की उदारता? या फिर ये है कीचड़ के गंदे पोखर की संर्कीणता।
समझ का अभाव सब झगड़ों की जननी है । मंजिल एक है : स्वयं को जानना । रास्ते अनेक हैं । प्रत्येक व्यक्ति को, उसके अनुकूल जो है, उसे चुन लेना चाहिए । उसे इसकी बहुत चिंता नहीं करनी चाहिए कि कौन गलत है, कौन सही है । उसे जानना चाहिए कि उसके अनुकूल, उसके स्वभाव के अनुकूल क्या है । दूसरों के मार्ग में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए । अपने स्वभाव को संपूर्णता से जीने वाला व्यक्ति कभी दूसरों की जिंदगी में हस्तक्षेप नहीं करता और न ही उनको सुधारने की कोशिश करता है ।
भई, प्रधानमंत्री तां हम कौन्या बण सक्यां कम ते कम अपणा मतदान ते करण की स्वेतंत्रता हमने होणी चईये के- देव-संस्कृाति ने वोट देवागें के, ओशो-संस्कृति ने। अब नेट ते बढिया जरिया कौन सा हो सकै अपनी बात रक्खेन को। मंसूर, सुकरात, ईसा सब अपणी बात ने कहण खातिर सूली चढगै पर बात जरूर कहगै आपणीं, तां मैं कैसे पचा सकू आपणी बात ने। बाकि समझ कि बात ते या सै कि हर आदमी मन मे यो जाणै कि खुदा ने अस्सी प्रतिशत अक्ल मेरे कूं दे राखि सै और बीस प्रतिशत से बाकि दुनिया गुजारा कर री है।
इब रौला ये भी सै कि ओशो कहवै कि जो जाणै वो बोले कोन्याण, जो बोले वो जाणै कोन्या । तां फिर अब हम किस के धौरे जा के ज्ञान प्राप्त करां। और वो उदारहण देते है नमक कि पुतली जोकि सागर की थाह खोजने जाती है तो वापिस नही लौटती स्वयं सागर हो जाती है। पर महाराज आजकल ते आपकी पुतलियां खूब बौलें अब हम भी चाहवा आपके चेलों कि तरहयां स्थितप्रज्ञ होण की पर साक्षी भाव में ना हमसे ठहरया जावे और न आपके शर्गिदों में ही ये खूबी देखण ताई मिली। वो कहते है कि ओशो बडे ऊचें स्तर की बात करते हैं तो महाराज संसार में तो मेरे जैसे आरम्भिक स्तर के लोगो का ही बाहुल्य है उन्हे स्नातक स्तर की विद्या क्या अपनी बडाई दिखाने खातिर दी जाणी उचित है।
खैर अब हमने तो समुंद्र मंथन करण की ठान ली अब विष निकले या अमृत। कंकर निकले या रतन।
मंथन जारी रक्खांगे। हरे कृष्ण।