राष्ट्रपती पद का चुनाव


हमारे वर्तमान राष्ट्रपती डॉ. अब्दुल कलाम जी का कार्यकाल समाप्त होने मे हैं| सारे देश मे सामान्य जनता की राय है की वोही दोबारा राष्ट्रपती बनें| लेकीन राजनीती मे लाभ के सिवा अन्य किसी बात की चिंता करने के दिन तो कब के चले गयें| सभी राजकिय पक्ष अपनी अपनी जुगाड मे लगे है|

इस परिप्रेक्षमे आपका अपना मत क्या है? डॉ. कलाम ही दोबारा राष्ट्रपती बने तो क्यों? और न बने तो क्यों?

डॉ. कलाम के अलावा राष्ट्रपती पद के लिये और कौन आपका पसदिदा उंम्मीदवार है?

राष्ट्रपति पद का चुनाव

भारत रत्न डॉ.कलाम आज समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में राष्ट्रपति पद के लिए सर्वोच्च विकल्प के रूप में उभर कर आयें हैं । इसके मूल में उनकी मेधा, दृष्टि, वैज्ञानिक चेतना और कार्य पद्धति है । वे बच्चों से लेकर जवान और बूढ़ों सभी के पसंदीदा हैं । लोग उन्हें ही दोबारा देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर देखना चाहते हैं । ताकि देश का चेतनात्मक विकास हो । ताकि देश का वैज्ञानिक विकास हो । देश में ईमानदारी और मौन साधना को प्रोत्साहन मिले । उनके राष्ट्रपति बनने से देश का गौरव सारे विश्व में बढ़ा है और विश्व में हमारी साख बढ़ी है । जिस गौरव को आज हम अनुभव करते हैं उससे हम वंचित न हो जायें इसके लिए भी वे सबकी पसंद हैं ।

यद्यपि राष्ट्रपति का पद भारतीय प्रजातंत्र में तटस्थ वृति और कम हस्तक्षेप कारी है तथापि वह गरिमामंडित पद है । यहाँ देश के प्रख्यात विद्वानो, वैज्ञानिको, कलाविदों, साहित्यकारों, समाजशास्त्रियो को देखने की भी भावना और इच्छा भी काम कर रही है । इस तरह से यह संकेत भी है कि देश का बहुसंख्यक वर्ग देश में शुचिता चाहता है । उसका देश के भ्रष्ट दलों के भ्रष्ट्र राजनीतिज्ञों से मोह भंग हो चुका है । यह साफ संकेत है इस बात का ।

आज मौका है कि राजनीतिज्ञ और तमाम दल प्रजातंत्र की बुनियाद और मर्म को समझकर उन्हें ही दोबारा राष्ट्रपति के पद पर बैठाने में वातावरण तैयार करें । पर विडम्बना ही है कि वे अपनी-अपनी जोड़-तोड़ में लग चुके हैं । कदाचित् कोई अच्छा राजनीतिज्ञ भी इस पर आसीन हो पर कलाम जब योग्य है, समर्थ हैं, देशसेवा की भावना हैं तो ऐसी कौन-सी मजबूरी है कि राजनीतिज्ञ उनके नाम पर विचार ही नहीं कर रहे हैं । इसका मतलब स्वार्थ के अलावा कुछ भी नहीं । यहाँ उनके देशसेवा की पोल भी खुलकर सामने आ जाती है । ऐसे समय में प्रजातंत्र और राष्ट्रपति का पद भी समीक्षा के घेरे में आ जाता है कि देश में फिर से एक बार विचार-विमर्श हो कि कैसे व्यक्तित्वों को आखिर राष्ट्रपति पद पर सुशोभित किया जाय ।