अनुभुति


युं हीं बैठे बैठे
सुबह हो गई,
और मेरी आंखो में
इक पल भी नींद न आई,
बातें किए हुए तुमसे,
कुछ ही घंटे तो बीते हैं,
पर इन कुछ घंटो को
सदियों सा जिया है मैंने,
कई खुशियों ने दस्तक दी मेरे मन में
कई डरों ने कब्जा किया मेरी आंखो पर
खुशी... तुमसे बातें करने की
डर... तुम्हें खो देने का
क्यों डरता हूं तुम्हे खोने के ख्याल से
जबकि मुझे तो ये भी नहीं पता
कभी कभी पा सकुंगा तुम्हें
आखिर कयों कलम उठाते ही शब्द
तुम्हारा ही चेहरा बनाते हैं
इतने दिनों के बाद भी आज तक भूल नही पाया हूं
तुम्हारे चेहरे को
हर पल यह मेरे आंखो में बसता हैं
चाहा था मैने भी कुछ देर सो जाऊं
दूर हो जाऊं तुम्हारी यादों से
पर तुम्हारी आवाज कानों में मेरी गुंजती रही लगातार
और इक पल के लिये भी सोने न दिया
आखिर क्यों तुम मुझे युं लगातार याद हो
अपनी शक्ति बनाना चाहता हूं तुम्हें
पर खुद को कमजोर पाता हूं
तुम्हे याद कर
एक बार बता दो मुझे तुम भी करती हो प्यार मुझे
ताकि छिपा सकूं अपनी कमजोरियों को
तुम्हारे प्यार की मजबूतियों के पीछे
और तुम्हें अपनी आंखो से हटाकर
अपने दिल में सदा के लिये बसा सकूं

................... अभिषेक प्रसाद 'अवि'..........