इंतजार


बाहर भागता अन्धेरा
और दूर कहीं नजर आती
इक रौशनी...
अन्धेरे के बीच अपना अस्तित्व बचाती
बाहर इक अथाह शांति
और भीतर
मन में तुम्हारी यादों की हलचल
कितने ही छोटे-छोटे स्टेशन
इन अन्धेरों में गुजर गये
बिल्कुल हमारी-तुम्हारी
उन छोटी-छोटी मुलाकातों तरह
नीचे बहती बिल्कुल शांत नदी
और उसपर यह हडहडाता पुल
जैसे हमारे बीच का अनकहा रिश्ता
और मेरे मन के भीतर
पुल की भांति हडहडाता तुम्हारा प्यार
कुछ ही घंटों में यह सफर मंजिल पा जएगी
पर कब तक करना होगा मुझे
अपने प्यार की मंजिल का
इंतजार....

....................अभिषेक प्रसाद "अवि".............

बहुत

बहुत उम्दा, आपकी कविता अच्छी हैं...... आप जैसे युवा कवियों की हमारे देश को जरूरत है.....