हिंदी साहित्य की दुर्दशा
प्रेषक अंशुमान सिंह ( 22 फरवरी, 2008 - 12:20 ) ।
आज हिंदी साहित्य की जो दुर्दशा हो रही है, कहीं न कहीं हम सभी लोग भी जिम्मेदार हैं. आज हम लोग भी अपने हिंदी भाषा के किसी भी स्रोत या साहित्य पर विश्वास नहीं करते हैं और अन्य पर जरूरत से ज्यादा. अगर विश्व के बडे बडे देश और संगठन हिंदी भाषा में काम कर रहे हैं और उसे मान्यता प्रदान कर रहे हैं तब अपने ही देश में अलग अलग प्रांतो में हिंदी पर इतना विवाद क्यों. देश की राष्ट्रभाषा होने के बावजूद इसके साथ किया जा रहा भेदभाव उचित नहीं है और सभी हिंदी प्रेमियों को इसके लिए सोचना होगा नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब हिंदी को भी दोयम दर्जे की भाषा बना दिया जायेगा.
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