साहित्य
भारत की साहित्यिक परंपरा
प्रेषक आजाद ( 25 मार्च, 2008 - 21:08 ) ।
भारत की साहित्यिक परंपरा अत्यंत प्राचीन है। सबसे पुराना जीवित साहित्य ऋग्वेद है जो संस्कृत भाषा में लिखा गया है। संस्कृत,पाली, प्राकृत और अपभ्रंश आदि अनेक भाषाओं से गुज़रते हुए आज हम भारतीय साहित्य के आधुनिक युग तक पहुंचे है
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हमारी स्वतंत्रता
प्रेषक नीलकांत ( 15 अगस्त, 2007 - 11:30 ) ।
आज संपुर्ण भारतवर्ष अपनी आजादी के हिरकमहोत्सवी वर्ष को बडे धुमधाम से मना रहा है| हमे स्वतंत्र हुये ६० साल हो चुके है| आज का यह दिन उन विरों को याद करने का है जिन्होने अपनी जान पर खेल कर यह आजादी हमे दी | उन सभी विरों का स्मरण कर उनके यो
गोपाल सिंह नेपाली स्मृति निबंध प्रतियोगिता
प्रेषक व्यवस्थापक ( 8 जुलाई, 2007 - 13:22 ) ।
भाषा, साहित्य और संस्कृति की वेब-पत्रिका सृजनगाथा डॉट कॉम, काव्यांजलि (बहुभाषीय एवं भारतीय संस्कृति के संवर्धन हेतु प्रतिबद्ध रेडियो सलाम नमस्ते, डलास, अमेरिका) के संयुक्त तत्वाधान में हिंदी के प्रभापुरुष एवं गीतकार स्व.
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गीत
प्रेषक गिरीशबिल्लोरे ( 4 जुलाई, 2007 - 21:04 ) ।
मन का पंछी
मन का पंछी खोजता ऊँचाइयाँ,
और ऊँची और ऊँची
उड़ानों में व्यस्त हैं।
चेतना संवेदना, आवेश के संत्रास में,
गुमशुदा हैं- चीखों में अनुनाद में।
फ़लसफ़ों का ,
दृढ़ किला भी ध्वस्त है।
मन का पंछी. . .
कब झुका कैसे झुका अज्ञात है,
जीतिए ढेरों ईनाम (यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता में भाग लीजिए)
प्रेषक व्यवस्थापक ( 2 जुलाई, 2007 - 15:41 ) ।
हिन्द-युग्म यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता के आयोजन की यह सातवीं उद्घोषणा है। हर बार प्रतियोगिता में नये आकर्षण जुड़ते रहते हैं। हमारी कोशिश रहती है कि अधिक से अधिक लेखकों और पाठकों को कुछ न कुछ भेंट कर पायें। चूँकि हमारा सा
आओ फ़िर से दिया जलाएँ
प्रेषक विकिपीडिया ( 5 जून, 2007 - 11:53 ) ।
आओ फिर से दिया जलाएं
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाईं से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएं।
आओ फिर से दिया जलाएं
हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोहजाल में-
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झुक नहीं सकते
प्रेषक विकिपीडिया ( 5 जून, 2007 - 11:45 ) ।
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते
सत्य का संघर्ष सत्ता से
न्याय लड़ता निरंकुशता से
अंधेरे ने दी चुनौती है
किरण अंतिम अस्त होती है
दीप निष्ठा का लिये निष्कम्प
वज्र टूटे या उठे भूकम्प
यह बराबर का नहीं है युद्ध
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कदम मिला कर चलना होगा
प्रेषक विकिपीडिया ( 5 जून, 2007 - 11:42 ) ।
बाधायें आती हैं आयें
घिरें प्रलय की घोर घटायें,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालायें,
निज हाथों में हंसते-हंसते,
आग लगाकर जलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।
हास्य-रूदन में, तूफानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
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आखिरी पत्ता (कहानी)
प्रेषक विकिपीडिया ( 5 जून, 2007 - 11:16 ) ।
वाशिंगटन चौक के पश्चिम की ओर एक छोटा-सा मुहल्ला है जिसमें टेढ़ी-मेढ़ी गलियों के जाल में कई बस्तियां बसी हुई हैं। ये बस्तियां बिना किसी तरतीब के बिखरी हुई है। कहीं-कहीं सड़क अपना ही रस्ता दो-तीन बार काट जाती है। इस सड़क के सम्बन्ध मे
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आज़ादी के छह दशक बाद हिंदी साहित्य
प्रेषक व्यवस्थापक ( 3 जून, 2007 - 19:51 ) ।
भारत की आज़ादी के छह दशकों में हर चीज़ में बदलाव आया है -सियासत में, विचारधाराओं में, समाज में, महिलाओं की स्थिति में. लेकिन साहित्य ने इन परिवर्तनों को किस तरह से लिया है. क्या ये परिवर्तन साहित्य में दिखाई पड़ते हैं और किस तरह?
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