मन्जिले थी दूर लेकिन
रास्ते अन्जान थे
जिस गली से भी मै गुजरा
लोग सब हैरान थे.
देखा नही ...सोचा नही कुछ

चलता रहा....चलता रहा

अपनी ही धुन मे
ख्वाव दिल मे
पलता रहा...पलता रहा

पसीना भी बहा
सब कुछ सहा
स्वाभिमान पर
ना झुका.

इन्तिहा अब

महगाई इस कदर बढ गई,
चीनी मुह को कडवा कर गई,
देसी घी विलुप्त हो गया,
बटूआ अपना खाली है.
काहे की दीवाली है

लगी आग तो तेल मे
काला बाजारी के खेल मे
दाल का खाना स्वप्न हो गया
खाली अपनी थाली है
काहे की दीवाली है

दिया-पटाखा, खील बताशा

दुनिया पर न कोई भरोसा
जड़ है ये चैतन्य नहीं है
चैतन्य है सूरत(आत्मा)
मत बन तू मुरख

धन, दौलत, संपत्ति अर्जन.
हैं सब मिथक- तू कर पृथक
किया संग जिसने दुनिया का
चढा रंग जिस पर दुनिया का
वह खपा सदा ही इस दुनिया में
रह जायेगी केवल सूरत

कैसी ये जिन्दगी

क्यों ये जिन्दगी बोझ सी लगती है
सुखी हुई घास पर ओस सी लगती है
व्यथित मन- क्या करें हम
आसान राहें भी
जमीदोज सी लगती है

नहीं है अपराध कोई
नहीं है अवसाद कोई
अंतर्द्वंद के आगोश में
खामोश सी लगती है

पथ
विचरो की सन्किर्ताओ से
अवरुध हो जाय
और
कोइ मार्ग न सूझता हो
तब
हर्दय के आन्गन मै
एक आशा का दीप जलाना
शायद वह पर्याप्त हो
लडने के लिये
मूसलाधार अन्धकार से

मौन मुखर हो गया, सहज वाणी भी जब
निर्द्वंद्व बनी
व्याकुल मन को आलोडित कर
तब पीडा एक छंद बनी !

काल-चक्र के पात्र में हंसकर
जब व्यतीत का कालकूट भर
वर्तमान कंटकयुत पथ पर
अभिलाषा मकरंद बनी
तब पीडा एक छंद बनी !

करुणा के क्षण नभ बन जाते


बस यही दे रही सदा मिट्टी
एक दिन होगा हर घड़ा मिट्टी

• एक दिन खुद बखुद ये होना है
तू तो मिट्टी में मत मिला मिट्टी

• रोंधता है कुम्हार मिट्टी को
उसको रोंधेगी देखना मिट्टी

• जाने कितनी दफा मिले बिछुड़े

जिंदगी एक सपना है
जब तक देखते हो
तब तक सच है
खूबसूरत सपने में
कारवां बनते हैं / बिछडते हैं
हम कितनी ही बार
गिरते हैं
उठते हैं
रोते हैं
हंसते हैं
जिंदगी एक सपना है
इसे जब तक देखो
पूरा लुत्फ उठाओ
पर...
इसमें खो मत जओ

जिंदगी केवल एक रात है !
किसी की रात लम्बी होती है
किसी की छोटी
हर इन्सान
इस एक रात में
कई सपने देखता है
छोटे छोटे सपने
बडे बडे सपने
कुछ पूरे हो जाते हैं
कुछ टूट जाते हैं ।
जब बडे सपने पूरे होते है
तब कई छोटे सपने भी पूरे हो जाते है ।

अभी आंख भी नहीं खुली थी
और नहीं ली थी अंगडाई
तभी द्वार पर दस्तक के संग
घंटी की आवाज भी आई

प्रश्न उठा मन में अलबेला
आखिर घंटी क्यों बजती है ?

सोच सोच कर फिर से सोचा
नींद सुहानी फिर से आई
स्वप्न एक भी नहीं दिखा था
पापा ने आवाज लगाई

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