प्रेमकाव्य
एक क्षण
प्रेषक विकी ( 31 जुलाई, 2007 - 20:38 ) ।
एक क्षण
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राह-ए-सरगम सुबह से खामोश सी
प्रेषक गिरीशबिल्लोरे ( 5 जुलाई, 2007 - 10:08 ) ।
राह-ए-सरगम सुबह से खामोश सी
रात बिजुरी दमकी है अरमानों में !!
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दो न दो आवाज़ हमको आप ने
जिस अदा से देखा है हम क्या कहें ..?
आज तक ये हम सह रहे हैं ये विरह
आप ही कहिये कि हम कितना सहें !!
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मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता?
प्रेषक व्यवस्थापक ( 5 जून, 2007 - 10:22 ) ।
मौन रात इस भांति कि जैसे, कोई गत वीणा पर बज कर,
अभी-अभी सोई खोई-सी, सपनों में तारों पर सिर धर
और दिशाओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं,
कान तुम्हारे तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता?
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