प्रेमकाव्य

एक क्षण


एक क्षण

राह-ए-सरगम सुबह से खामोश सी


राह-ए-सरगम सुबह से खामोश सी
रात बिजुरी दमकी है अरमानों में !!
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दो न दो आवाज़ हमको आप ने
जिस अदा से देखा है हम क्या कहें ..?
आज तक ये हम सह रहे हैं ये विरह
आप ही कहिये कि हम कितना सहें !!

मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता?


मौन रात इस भांति कि जैसे, कोई गत वीणा पर बज कर,
अभी-अभी सोई खोई-सी, सपनों में तारों पर सिर धर
और दिशाओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं,
कान तुम्हारे तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता?

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