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थी चपल हुई सरल , प्रेम राग है यही
नयनों ने कह डाली बातें सब अनकही
नेह का निवाला लिए दौड़ती फिरूं मैं क्यों
पीहर के संयम को आजमा रहा है मन !
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भोर की प्रतीक्षिता,कब तलक रुकूं कहो
दुनिया पर न कोई भरोसा
जड़ है ये चैतन्य नहीं है
चैतन्य है सूरत(आत्मा)
मत बन तू मुरख
धन, दौलत, संपत्ति अर्जन.
हैं सब मिथक- तू कर पृथक
किया संग जिसने दुनिया का
चढा रंग जिस पर दुनिया का
वह खपा सदा ही इस दुनिया में
रह जायेगी केवल सूरत
कैसी ये जिन्दगी
क्यों ये जिन्दगी बोझ सी लगती है
सुखी हुई घास पर ओस सी लगती है
व्यथित मन- क्या करें हम
आसान राहें भी
जमीदोज सी लगती है
नहीं है अपराध कोई
नहीं है अवसाद कोई
अंतर्द्वंद के आगोश में
खामोश सी लगती है
खंडित सोच खंडित विचारवाद,
खंडित मनुष्य,खंडित समाज,
खंडित नेता, खंडित दल,खंडित लोकतंत्र,
खंडित धर्मगुरू,खंडित धर्म,खंडित धर्मतंत्र,
खंडित धनिक, खंडित धन्धे,खंडित अर्थतंत्र,
सत्य मध्य मे है यह बहुत बडा झूठ है जो प्रायः बोला जाता है सत्य तो अनन्त है सर्वत्र व्याप्त है अनन्त जिज्ञासा के साथ सदैव पृश्नकर्ता बने रह कर उसका बोध किया जा सकता है। सत्य बोध से झूठ ,अज्ञान, का उच्छेदन किया जा सकता है सत्यबोध से, सत
विवेकानन्द जैसे महान विद्वान ने ज्ञान को जनसाधारण के लिये उपयोगी तथा मानवता की मुक्ति के लिए व्यावहारिक बनाने के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन लगा दिया सच्चे ज्ञानी स्वतःस्फूर्त रुप से ज्ञान का स्वार्थ के लिए नही अपितु सर्वार्थ
ओशो की डायरी से चुने गए कुछ विचार-बिंदु :
१.सत्य सरल है, शेष सब जटिल है, लेकिन हम सरल नहीं हैं, इसलिए सत्य को पाना कठिन हो जाता है ।
मनुष्य के व्यक्तित्व में सबसे बड़ा अंतर्द्वन्द्व इस मान्यता से पैदा होता है कि उसका शरीर और उसकी आत्मा विरोधी सत्य हैं । यह स्वीकृति आधारभूत रूप से मनुष्य को विभाजित कर देती है । फिर स्वभावत: इन दोनों विभाजित खेमों में संघर्ष और कल
जीवन क्या है ?
सुख दुख की छाया
या प्रेम,ध्यान का उत्सव
जिसे जीना है हर हाल में
जीवन क्या है ?
दिन और रात का एक क्रम
जिसमें हैं दिन के उजाले और रातों के अंधेरे
जिसे काटना है किसी तरह
जीवन क्या है ?
अस्तित्व की एक यात्रा