सद्भावना
जाकों कुछ न चाहिएँ, वोहिं शहनशाहँ
प्रेषक आजाद ( 6 अगस्त, 2007 - 19:41 ) ।
धन नही चाहिए प्रभु मुझे राज्य नही चाहिए। केवल ये इच्छा है कि मै सन्तोषी हो जाऊँ। लोगों के दु:ख दूर हो। सबके कल्याण की कामना मेरे ह्रदय मे प्रस्फुटित होती रहे।
सन्तोषी व्यक्ति के समान कोई सुखी नही और असन्तोषी के समान कोई दुखी नही।
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