जब कभी तुम समस्याओं से घिर जाओ
और कोई ध्यान रखने वाला न हो
और कहीं कोई दोस्त न मिले
तो स्मरण कीजिए कि परमात्मा तुम्हारे निकट है
वह तुम्हारी हर प्रार्थना सुनता है
जब यह जीवन सूना दिखाई पड़े
और सारे सपने टूटते दिखाई पड़ें
मन्जिले थी दूर लेकिन
रास्ते अन्जान थे
जिस गली से भी मै गुजरा
लोग सब हैरान थे.
देखा नही ...सोचा नही कुछ
चलता रहा....चलता रहा
अपनी ही धुन मे
ख्वाव दिल मे
पलता रहा...पलता रहा
पसीना भी बहा
सब कुछ सहा
स्वाभिमान पर
ना झुका.
इन्तिहा अब
सत्य कहाँ है
जिसे खोजते जीवन बीता
ढूंढ सका ना, रहा ही रीता
दीर्घ डगर और अन्तिम वेला
अब ढूंढो- अमरत्व कहाँ है
सत्य कहाँ है?
आए खाली, जाए खाली
क्यों कर ऐसी, आदत डाली
भौतिक अर्जन!
तत्व कहाँ है?
सत्य कहाँ है?
राह सही थी, तू ही भटका
प्रसिद्ध दार्शनिक नीत्शे ने कहा है :
विशाल जन-समूह निरे साधन हैं
अथवा रुकावटें
या नकलें हैं
महान कार्य ऐसी सामूहिक हलचल पर
निर्भर नहीं हुआ करते,
क्योंकि सर्वोत्तम और सर्वश्रेष्ठ का भी
जन-समूह पर कोई
प्रभाव नहीं !
पथ
विचरो की सन्किर्ताओ से
अवरुध हो जाय
और
कोइ मार्ग न सूझता हो
तब
हर्दय के आन्गन मै
एक आशा का दीप जलाना
शायद वह पर्याप्त हो
लडने के लिये
मूसलाधार अन्धकार से
सुबह लगभग पौने पांच बजे आंख खुल गई । धडकते हृदय से बालकनी में झांक कर देखा तो सबकुछ ठहरा ठहरा सा महसूस हुआ । उसने दूध नही पिया ? उस्ने गंदगी भी नहीं की ? वह सो रहा था ?
दुबारा दिया दूध उसने नहीं पिया ।राहत की सांस ले वह सोता ही मिला मुझे ।शाम को थोडी देर बालकनी में घूमने के बाद वह लेट गया । मैंने उसे नजर भर देखा और अपने कामो में उलझ गई । रात को सोने से पहले मैं फिर उसे देखने गई ।इधर उधर गंदगी फैलाने के
अब क्या करूं ? दोनों हाथों में कोमलता से उठा कर मैं यह सोच ही रही थी कि मेरी निगाह कुछ दूरी पर बैठे एक काले कुत्ते पर पडी । दिल की एक धडकन जोर से धडकी । कहीं यह कुत इसे नोंच न डाले ।
बालकनी का गेट फिर खोला । उस आवाज का पीछा करती नजरें पीछे की नाली में रिरियाते कुत्ते के छोटे से पिल्ले पर पडीं । नाले में जरा सा पानी बह रहा था । ना जाने कैसे यह नन्हीं जान इसमे गिर गई !
किचन में काम करते करते कई बार मेरा ध्यान खिडकी से बाहर से आ रही
एक कसक भरी सिसकी, एक रिरियाहट, एक टीस, एक धीमी चीख की ओर बार बार जा रहा था । एक दो बार खिडकी से झांका भी, पर कुछ न दिखा ।