सुझाव
हिंदी साहित्य की दुर्दशा
प्रेषक अंशुमान सिंह ( 22 फरवरी, 2008 - 12:20 ) ।
आज हिंदी साहित्य की जो दुर्दशा हो रही है, कहीं न कहीं हम सभी लोग भी जिम्मेदार हैं. आज हम लोग भी अपने हिंदी भाषा के किसी भी स्रोत या साहित्य पर विश्वास नहीं करते हैं और अन्य पर जरूरत से ज्यादा.
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पौराणिक मान्यताओं को सिरे से खारिज ना करें....
प्रेषक सुरेश चिपलूनकर ( 12 जुलाई, 2007 - 15:56 ) ।
क्या किसी देश का इतिहास या उसकी पौराणिक मान्यतायें शर्म का विषय हो सकती हैं ? यदि हजारों वर्षों के इतिहास में कोई शर्म का विषय है भी, तो उसके मायने अलग-अलग समुदायों के लिये अलग-अलग क्यों होना चाहिये ?
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हिंदीभाषी से आपकी अपेक्षांएं |
प्रेषक व्यवस्थापक ( 8 जुलाई, 2007 - 13:38 ) ।
हिंदीभाषी के सभी सदस्योंसे यह आवाहन है की इस जगह पर आपको हिंदीभाषी इस जालस्थल से क्या अपेक्षांएं है तथा आपकी अपेक्षांओं पर हिंदीभाषी कितना खरा उतर रहा है इस बारे में लिखे|
