लेख
होली के नए रंग
प्रेषक आजाद ( 21 मार्च, 2008 - 20:36 ) ।
फागुन आते ही फिजां की रंगत रंगीन होने लगती है और लोगों पर फागुनी रंग चढ़ जाता है। हर तरफ मौज मस्ती, हल्ला-गुल्ला और गीत-संगीत से सारा आलम सराबोर। बदले वक्त ने होली का स्वरूप भले ही आधुनिक कर दिया हो, लेकिन होली के लोकगीतों में जो छ
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हमारी स्वतंत्रता
प्रेषक नीलकांत ( 15 अगस्त, 2007 - 11:30 ) ।
आज संपुर्ण भारतवर्ष अपनी आजादी के हिरकमहोत्सवी वर्ष को बडे धुमधाम से मना रहा है| हमे स्वतंत्र हुये ६० साल हो चुके है| आज का यह दिन उन विरों को याद करने का है जिन्होने अपनी जान पर खेल कर यह आजादी हमे दी | उन सभी विरों का स्मरण कर उनके यो
शरणागति
प्रेषक आजाद ( 8 अगस्त, 2007 - 12:20 ) ।
एक दिन मन बड़ा अशान्त था। विचारों की लहरें बहा कर ना जानें किधर ले जा रही थी मन को। चिंता के समुन्द्र में डूबता जा रहा था- डूबता जा रहा था। क्या जो मैं कर रहा हूं उचित है या अनुचित, जीवन की गाड़ी सही दिशा में आगे बढ़ रही है या गलत दिश
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एक क्षण
प्रेषक विकी ( 31 जुलाई, 2007 - 20:38 ) ।
एक क्षण
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हँसो और हँसाओं
प्रेषक आजाद ( 10 जुलाई, 2007 - 23:36 ) ।
दुनिया भी विचित्र है, मुस्कराते व्यक्ति को महान नहीं बताएँगी, जितना उदास,गम्भीर व्यक्ति उतना ही दुनिया को उसमें महानता नज़र आती है।
प्रेरक प्रसंग - छोटा या बड़ा
प्रेषक आजाद ( 10 जुलाई, 2007 - 23:05 ) ।
मगनबाड़ी आश्रम में महात्मा गाँधी ने एक बार यह योजना बनाई कि सबके जूठे बरतन बारी-बारी से दो-तीन व्यक्ति मांजा करें । इससे आश्रमवासियों में प्रेम भाव बढेगा तथा एक दूसरे के बर्तन साफ करने से जो घृणा होती है उससे भी छुटकारा मिलेगा ।
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तथास्तु
प्रेषक आजाद ( 10 जुलाई, 2007 - 22:36 ) ।
भगवान का दरबार लगा था। सभी लोगों ने उनसे विभिन्न प्रार्थनाएँ की थीं। एक-एक कर वे उनके सामने प्रस्तुत की जा रही थीं। एक सेठ की प्रार्थना सुनकर परमात्मा को बडा आश्चर्य हुआ।
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बैकुंठ चलो
प्रेषक आजाद ( 10 जुलाई, 2007 - 22:35 ) ।
एक बार यम लोक मे उदासी छा गई, हुआ यह था कि पहले वहाँ मृत्युलोक से आई जीव आत्माओ की भीड़ लगी रहती थी! काम इतना था कि न चित्रगुप्त को लेखेजोखे से फुरसत मिल पाती थी, न ही यमराज को पल भर चैन मिलता था! लेकिन अब बात वैसी ना रही!
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कागज : एक राष्ट्रीय संपत्ति
प्रेषक सुरेश चिपलूनकर ( 1 जुलाई, 2007 - 11:30 ) ।
सन २००४ के आम चुनाव भारत के लिये बेहद महत्वपूर्ण साबित हुए हैं, राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं बल्कि पर्यावरणीय दृष्टिकोण से, क्योंकि विश्व के इन सबसे बडे चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का देशव्यापी उपयोग किया गया, जिसके का
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सब भगवद्लीला है।
प्रेषक आजाद ( 27 जून, 2007 - 12:13 ) ।
तुम पर भगवान की कृपा नित्य-निरन्तर बरस रही है। तुम्हे सदा सब ओर से नहला रही है। ऐसा कोई क्षण नहीं जब तुम उनकी कृपा से वंचित रहते हो। रहते भी कैसे?
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