धर्म

आजाद वाणी


श्री सत गुरु देवाय नम:
आजाद वाणी
1-‘आजाद’ लोभ ना कीजिए,लोभ पाप का मूल
लोभ के मन मे आत ही,धर्म जाए सब भूल

2-‘आजाद’ मांगो मत कछु,मांगन से यश जाए
मागंन से ही देखो हरी, वामन थे कहाए

3-‘आजाद’ सत्संग मे रहो,दु:ख रहेगें दूर

कबीर की भक्ति


ओशो दर्शनशास्‍त्री नहीं तर्कशास्‍त्री।


ओशो को दर्शनशास्‍त्री ना कहकर तर्कशास्‍त्री कहना उपयुक्‍त रहेगा। ना उनकी कोई राह, न उनका कोई सिद्धांत, बस तर्क से अपनी बात को सही सिद्ध करना मात्र उनका लक्ष्‍य लगता है। ''आज एक विचार प्रकट किया तो कल अपने ही विचारों को अपनी वाकपटुत

श्रीकृष्ण की अलौकिक लीला


भारतीय संस्कृति में पूजित दशावतारों में से आठवें अवतार श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को 5229 साल पहले हुआ था। इस समय कलियुग को प्रारम्भ हुए 5109 वर्ष हुए हैं और श्रीकृष्ण ने 120 साल तक भारत भूमि को अपनी लीलाओं से प

आनन्‍द की खोज


मानव इस संसार रूपी मरूभूमि में बार-बार भागता है, दौड़ता है, भटकता है और थक-हार जाता है। कहीं कोई सारवस्तु उसे नहीं मिलती। अनेकों संकल्प-विकल्पों से लालायित होकर भागता है और अंततोगत्वा वहां पहुंचने से पूर्व ही उसे आभास हो जाता है कि य

शरणागति


एक दिन मन बड़ा अशान्‍त था। विचारों की लहरें बहा कर ना जानें किधर ले जा रही थी मन को। चिंता के समुन्‍द्र में डूबता जा रहा था- डूबता जा रहा था। क्‍या जो मैं कर रहा हूं उचित है या अनुचित, जीवन की गाड़ी सही दिशा में आगे बढ़ रही है या गलत दिश

जाकों कुछ न चाहिएँ, वोहिं शहनशाहँ


धन नही चाहिए प्रभु मुझे राज्य नही चाहिए। केवल ये इच्छा है कि मै सन्तोषी हो जाऊँ। लोगों के दु:ख दूर हो। सबके कल्याण की कामना मेरे ह्रदय मे प्रस्फुटित होती रहे।
सन्तोषी व्यक्ति के समान कोई सुखी नही और असन्तोषी के समान कोई दुखी नही।

कौन सी राह चुनियेगा ज़नाब?


१-भक्ति
२-ज्ञान
३-निष्‍काम-कर्म
४-अष्‍टांग-योग
समन्वित(चारों का मिलान)

तथास्तु


भगवान का दरबार लगा था। सभी लोगों ने उनसे विभिन्न प्रार्थनाएँ की थीं। एक-एक कर वे उनके सामने प्रस्तुत की जा रही थीं। एक सेठ की प्रार्थना सुनकर परमात्मा को बडा आश्चर्य हुआ।

बैकुंठ चलो


एक बार यम लोक मे उदासी छा गई, हुआ यह था कि पहले वहाँ मृत्युलोक से आई जीव आत्माओ की भीड़ लगी रहती थी! काम इतना था कि न चित्रगुप्त को लेखेजोखे से फुरसत मिल पाती थी, न ही यमराज को पल भर चैन मिलता था! लेकिन अब बात वैसी ना रही!

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